Sunday, October 15, 2017

General Hindi Grammar Theory Part - 1


Alppraan and Mahapraan Alphabets (अल्पप्राण और महाप्राण)
अल्पप्राण और महाप्राण :- जिन वर्णों के उच्चारण में मुख से कम श्वास निकले उन्हें  'अल्पप्राण ' कहते हैं ! और जिनके उच्चारण में अधिक श्वास निकले उन्हें ' महाप्राण 'कहते हैं!
ये वर्ण इस प्रकार है - 



      अल्पप्राण                          महाप्राण

     क , ग , ङ                          ख , घ 

     च , ज , ञ                         छ , झ 

     ट , ड , ण                          ठ , ढ 

     त , द , न                          थ , ध 

     प , ब , म                          फ , भ 

     य , र , ल , व                      श , ष , स , ह 


Anviti in Hindi अन्विति :
जब वाक्य के संज्ञा पद के लिंग, वचन, पुरुष, कारक के अनुसार किसी दूसरे पद में समान परिवर्तन हो जाता है तो उसे अन्विति  कहते हैं। 
अन्विति का प्रयोग निम्नलिखित प्रकार से होता है:-

(क) कर्तरि प्रयोग:- जिस में क्रिया के पुरुष, लिंग और वचन कर्ता के अनुसार होते हैं, क्रिया के उस प्रयोग को कर्तरि प्रयोग कहते हैं। यह ज़रूरी है कि कर्ता विभक्ति रहित हो जैसे गीता पुस्तक पढेगी। 

(ख) कर्मणि प्रयोग:- जिस में क्रिया के लिंग और वचन कर्म के अनुसार हों उसे कर्मणि प्रयोग कहते हैं। कर्मणि प्रयोग में दो प्रकार की वाक्य रचनाएं मिलती हैं। कर्तृवाच्य की जिन भूतकालिक क्रियाओं के कर्ता के साथ 'ने' विभक्ति लगी होती है जैसे राम ने पत्र लिखा। दूसरे कर्मवाच्य में यहाँ कर्ता के साथ 'से' या 'के द्वारा' परसर्ग लगते हैं लेकिन कर्म के साथ 'को' परसर्ग नहीं लगता जैसे हमसे लड़के गिने गए। 

(ग) भावे प्रयोग: - इसमें क्रिया के पुरुष लिंग और वचन कर्ता या कर्म के अनुसार न होकर सदा अन्य पुरुष पुल्लिंग एकवचन में ही रहते हैं। तीनों वाक्यों की क्रियाएं भावे प्रयोग में देखी जाती हैं।      

उदाहरण (भाववाच्य) :-

मुझसे हंसा गया।
तुम सब से हंसा गया। 
उन सब से हंसा गया।  

उदाहरण (कर्तृवाच्य) :-

राम ने भाई को पढ़ाया।
हमने बहन को पढ़ाया।
राम ने सब को पढ़ाया। 

उदाहरण (कर्मवाच्य) :-

अध्यापक द्वारा पुत्र को पढ़ाया गया।
अध्यापक द्वारा पुत्री को पढ़ाया गया। 
अध्यापकों द्वारा बच्चों को पढ़ाया गया।


इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि कर्तृवाच्य में क्रिया के कर्तरि, कर्मणि और भावे तीनों प्रयोग होते हैं। कर्मवाच्य में क्रिया कर्मणि और भावे प्रयोग में ही आती हैं जबकि भाववाच्य में क्रिया का केवल भावे प्रयोग ही होता है। 



लिंग :- संज्ञा के जिस रूप से किसी जाति  का बोध होता है ,उसे लिंग कहते हैं !
इसके दो भेद होते हैं :-







1-  पुल्लिंग :-  जिस संज्ञा शब्दों से पुरुष जाति का बोध होता है , उसे पुल्लिंग कहते हैं -  जैसे - बेटा , राजा  आदि !

2-  स्त्रीलिंग :-  जिन संज्ञा शब्दों से स्त्री जाति का  बोध होता है, उसे स्त्रीलिंग कहते हैं -  जैसे -  बेटी , रानी आदि !


स्त्रीलिंग प्रत्यय -


पुल्लिंग शब्द को स्त्रीलिंग बनाने के लिए कुछ प्रत्ययों को शब्द में जोड़ा जाता है जिन्हें स्त्री प्रत्यय कहते हैं ! जैसे - 


1.   =   बड़ा - बड़ी , भला - भली 



2.  इनी =  योगी - योगिनी , कमल - कमलिनी 



3.  इन =   धोबी - धोबिन , तेली - तेलिन 



4.  नी =   मोर - मोरनी , चोर - चोरनी 



5.  आनी =  जेठ - जेठानी , देवर - देवरानी 



6.  आइन =   ठाकुर - ठकुराइन , पंडित - पंडिताइन 



7.  इया =   बेटा - बिटिया , लोटा - लुटिया 


कुछ शब्द अर्थ की द्रष्टि से समान होते हुए भी लिंग की द्रष्टि से भिन्न होते हैं ! उनका उचित प्रयोग करना चाहिए !जैसे -               

      पुल्लिंग                        स्त्रीलिंग 

                     
1.   कवि                            कवयित्री 



2.   विद्वान                          विदुषी 



3.   नेता                             नेत्री 



4.   महान                           महती 



5.   साधु                             साध्वी 



(  ऊपर दिए गए  शब्दों का सही प्रयोग करने पर ही शुद्ध वाक्य बनता है !  )



जैसे :-   1-  वह एक विद्वान लेखिका है -   (  अशुद्ध वाक्य  )

                 
                 वह एक विदुषी लेखिका है -   (   शुद्ध वाक्य    )


घोष और अघोष :- ध्वनि की दृष्टि से जिन व्यंजन वर्णों के उच्चारण में स्वरतन्त्रियाँ झंकृत होती है , उन्हें ' घोष ' कहते है और जिनमें स्वरतन्त्रियाँ झंकृत नहीं होती उन्हें ' अघोष ' व्यंजन कहते हैं ! ये घोष - अघोष व्यंजन इस प्रकार हैं - 

     
  घोष                         अघोष


   ग , घ ,  ङ                    क , ख 
  
   ज , झ ,  ञ                   च , छ 

   ड , द , ण , ड़ , ढ़            ट , ठ 

   द , ध , न                      त , थ 

   ब , भ , म                      प , फ 

   य , र , ल , व , ह             श , ष , स 


विशेषण : जो किसी संज्ञा या सर्वनामकी विशेषता बताता है उसे विशेषण कहते हैं। 

जैसे: मोटा आदमी, नीला आसमान आदि। 




विशेषण के चार भेद होते हैं: 

1. गुणवाचक विशेषण : जो शब्द किसी व्यक्ति या वस्तु  के गुण, दोष, रंग, आकार, अवस्था, स्तिथि, स्वभाव, दशा, दिशा, स्पर्श, गंध, स्वाद आदि का बोध कराये, गुणवाचक विशेषण कहलाते हैं, जैसे काला, गोरा, अच्छा, सुंदर, ख़राब, गीला , रोगी, छोटा, कठोर, कोमल , खट्टा, नमकीन, बिहारी, सुगन्धित आदि। 

2. परिमाणवाचक विशेषण: वह विशेषण जो अपने विशेष्यों की निश्चित या अनिश्चित मात्रा का बोध कराए। 
     इसके दो भेद होते हैं 
     1. निश्चित परिमाणवाचक विशेषण:- जहाँ नाप, तोल या माप निश्चित हो, जैसे एक किलो चीनी, दो मीटर कपडा। 
     2. अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण: :- जहाँ नाप, तोल या माप अनिश्चित हो जैसे थोड़ी चीनी, कुछ लकड़ी। 
3. संख्यावाचक विशेषण :- संख्या संबंधी विशेषता बताने वाले शब्दों को संख्यावाचक विशेषण कहते हैं।
     ये दो प्रकार के होते हैं:
     1. निश्चित संख्यावाचक विशेषण: जहाँ संख्या निश्चित हो, जैसे पांचलड़के, दो छात्र। 
     2. अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण: जहाँ संख्या अनिश्चित हो जैसे सैंकड़ोंलोग, अनेक लडकियां।
4. सार्वनामिक विशेषण :- वे सर्वनाम शब्द जो संज्ञा शब्द से पहले आकर उसकी विशेषता बताते हैं, सार्वनामिक विशेषण कहलाते हैं, जैसे 
     कौन लोग आये हैं ?



विशेषण : जो किसी संज्ञा या सर्वनामकी विशेषता बताता है उसे विशेषण कहते हैं। 

जैसे: मोटा आदमी, नीला आसमान आदि। 




विशेषण के चार भेद होते हैं: 

1. गुणवाचक विशेषण : जो शब्द किसी व्यक्ति या वस्तु  के गुण, दोष, रंग, आकार, अवस्था, स्तिथि, स्वभाव, दशा, दिशा, स्पर्श, गंध, स्वाद आदि का बोध कराये, गुणवाचक विशेषण कहलाते हैं, जैसे काला, गोरा, अच्छा, सुंदर, ख़राब, गीला , रोगी, छोटा, कठोर, कोमल , खट्टा, नमकीन, बिहारी, सुगन्धित आदि। 

2. परिमाणवाचक विशेषण: वह विशेषण जो अपने विशेष्यों की निश्चित या अनिश्चित मात्रा का बोध कराए। 
     इसके दो भेद होते हैं 
     1. निश्चित परिमाणवाचक विशेषण:- जहाँ नाप, तोल या माप निश्चित हो, जैसे एक किलो चीनी, दो मीटर कपडा। 
     2. अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण: :- जहाँ नाप, तोल या माप अनिश्चित हो जैसे थोड़ी चीनी, कुछ लकड़ी। 
3. संख्यावाचक विशेषण :- संख्या संबंधी विशेषता बताने वाले शब्दों को संख्यावाचक विशेषण कहते हैं।
     ये दो प्रकार के होते हैं:
     1. निश्चित संख्यावाचक विशेषण: जहाँ संख्या निश्चित हो, जैसे पांचलड़के, दो छात्र। 
     2. अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण: जहाँ संख्या अनिश्चित हो जैसे सैंकड़ोंलोग, अनेक लडकियां।
4. सार्वनामिक विशेषण :- वे सर्वनाम शब्द जो संज्ञा शब्द से पहले आकर उसकी विशेषता बताते हैं, सार्वनामिक विशेषण कहलाते हैं, जैसे 
     कौन लोग आये हैं ?



Hindi Antonyms - विलोम शब्द :
1. अग्र - पश्च 
2. अज्ञ - विज्ञ 
3. अमृत -विष 

4. अथ - इति 
5. अघोष - सघोष 
6. अधम - उत्तम 
7. अपकार - उपकार 
8. अपेक्षा - उपेक्षा 
9. अस्त - उदय 
10. अनुरक्त - विरक्त 
11. अनुराग - विराग 
12. अन्तरंग - बहिरंग 
13. अवतल - उत्तल 
14. अवर - प्रवर 
15. अमर - मर्त्य 
16. अर्पण - ग्रहण 
17. अवनि - अम्बर 
18. अपमान - सम्मान 
19. अतिवृष्टि - अनावृष्टि 
20. अनुकूल - प्रतिकूल 
21. अन्तर्द्वन्द्व - बहिर्द्वन्द्व 
22. अग्रज - अनुज 
23. अकाल - सुकाल 
24. अर्थ - अनर्थ 
25. अँधेरा - उजाला 
26. अपेक्षित - अनपेक्षित 
27. आदि - अन्त 
28. आस्तिक - नास्तिक 
29. आरम्भ - समापन 
30. आहूत - अनाहूत 
31. आयात - निर्यात 
32. आभ्यन्तर - बाह्य
33. आवृत - अनावृत 
34. आशा - निराशा 
35. आरोहण - अवरोहण 
36. आस्था - अनास्था 
37. आर्द्र - शुष्क 
38. आकाश - पाताल 
39. आवाहन - विसर्जन 
40. आविर्भाव - तिरोभाव 
41. आरोह - अवरोह 
42. आदान - प्रदान 
43. आगामी - विगत 
44. आदर -अनादर 
45. आकर्षण - विकर्षण 
46. आर्य - अनार्य 
47. आश्रित - अनाश्रित 
48. इष्ट - अनिष्ट 
49. इहलोक - परलोक 
50. उग्र - सौम्य 
51. उदात्त - अनुदात्त 
52. उत्कृष्ट - निकृष्ट 
53. उपसर्ग - परसर्ग  
54. उन्मुख - विमुख 
55. उन्नत - अवनत 
56. उद्दत - विनीत 
57. उपमान - उपमेय 
58. उपत्यका - अधित्यका 
59. उत्तरायण - दक्षिणायन 
60. उन्मूलन - रोपण 
61. उष्ण - शीत 
62. उदयाचल - अस्ताचल 
63. उपयुक्त - अनुपयुक्त 
64. उच्च - निम्न 
65. एड़ी - चोटी 
66. ऐहिक - पारलौकिक 
67. औचित्य - अनौचित्य 
68. एक - अनेक 
69. एकत्र - विकीर्ण 
70. एकता - अनेकता 
71. एकाग्र - चंचल 
72. ऐतिहासिक - अनैतिहासिक 
73. औपचारिक - अनौपचारिक 
74. ऋजु - वक्र 
75. ऋत - अनृत 
76. कटु - सरल 
77. कनिष्ट - जयेष्ट 
78. कृष्ण - शुक्ल 
79. कुटिल - सरल 
80. कृत्रिम - अकृत्रिम 
81. करुण - निष्ठुर 
82. कायर - वीर 
83. कुलीन - अकुलीन 
84. क्रय - विक्रय 
85. कल्पित - यथार्थ 
86. कृतज्ञ - कृतघ्न 
87. कोप -कृपा 
88. क्रोध - क्षमा 
89. कृश - स्थूल 
90. क्रिया - प्रतिक्रिया 
91. खण्डन - मण्डन 
92. खरा - खोटा 
93. खाद्य - अखाद्य 
94. गुप्त - प्रकट 
95. गरल - सुधा 
96. गम्भीर - वाचाल 
97. गुरु - लघु 
98. गौरव - लाघव 
99. गोचर - अगोचर 
100. गुण - दोष 
101. ग्राम्य - नागर 
102. घृणा - प्रेम 
103. चिरंतन - नश्वर 
104. चल - अचल 
105. चंचल - अचंचल 
106. चिर - अचिर 
107. जीवन - मरण 
108. जाग्रत - सुप्त 
109. जंगम - स्थावर 
110. जागरण - सुषुप्ति 
111. ज्योति - तम 
112. तरुण - वृद्ध 
113. तृप्त - अतृप्त 
114. तृष्णा - तृप्ति 
115. तीक्ष्ण - कुंठित 
116. दण्ड - पुरस्कार 
117. दानी - कृपण 
118. दुरात्मा - महात्मा 
119. देव - दानव 
120. दिन - रात 
121. धृष्ट - विनीत 
122. निरर्थक - सार्थक 
123. निर्दय - सदय 
124. निषिद्ध - विहित 
125. नैसर्गिक - कृत्रिम 
126. निष्काम - सकाम 
127. परतन्त्र - स्वतन्त्र 
128. प्राचीन - नवीन 
129. प्राची - प्रतीची 
130. प्रभु - भृत्य 
131. प्रसाद - अवसाद 
132. पूर्ववर्ती - परवर्ती  
133. पाश्चात्य - पौवार्त्य 
134. बंजर - उर्वर 
135. भला - बुरा 
136. भूत - भविष्य 
137. मुख्य - गौण 
138. मनुज - दनुज 
139. मूक - वाचाल 
140. मन्द - तीव्र 
141. मौखिक - लिखित 
142. योगी -भोगी 
143. युद्ध - शान्ति 
144. यश - अपयश 
145. योग्य - अयोग्य 
146. राजा - रंक 
147. रक्षक -भक्षक 
148. रुग्ण - स्वस्थ 
149. रुदन - हास्य 
150. रिक्त - पूर्ण 
151. लौकिक - अलौकिक 
152. लम्बा - चौड़ा 
153. व्यास - समास 
154. विख्यात - कुख्यात 
155. विधि - निषेध 
156. विपन्न - सम्पन्न 
157. विपदा - सम्पदा 
158. वृष्टि - अनावृष्टि 
159. शासक - शासित 
160. शिष्ट - अशिष्ट 
161. शिख- नख 
162. श्याम - श्वेत 
163. शोक - हर्ष 
164. शोषक - पोषक 
165. सत्कार - तिरस्कार 
166. संक्षेप - विस्तार 
167. सूक्ष्म - स्थूल 
168. संगठन - विघटन 
169. संयोग - वियोग 
170. सुमति - कुमति 
171. सत्कर्म - दुष्कर्म 
172. सामिष - निरामिष 
173. स्मरण - विस्मरण 
174. संसदीय - असंसदीय 
175. सृजन - संहार 
176. क्षय - अक्षय 
177. क्षुद्र - विराट 
178. ज्ञेय - अज्ञेय 
179. स्वीकृति - अस्वीकृति 
180. भौतिक - आध्यात्मिक 


1- राष्ट्रभाषा - किसी देश के बहुसंख्यक लोगों की भाषा को राष्ट्रभाषा कहा जाता है । भारत के बहुसंख्यक लोग हिंदी को बोलते -समझते हैं ,अत: भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है ! यह भाषा अन्य किसी भी भारतीय भाषा की तुलना में अधिक लोगों के द्वारा प्रयोग में लाई जाती है , इसलिए हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा कही जाती है !


2- राजभाषा - राजभाषा का अर्थ है - सरकारी कामकाज की भाषा । जो भाषा संविधान द्वारा सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकृत होती है , उसे उस देश की राजभाषा कहते हैं ! भारत में हिंदी को संविधान की धारा 343  अध्याय -1 भाग -17 के अनुसार राजभाषा घोषित किया जा चुका है ! इसके अनुसार - " संघ की भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी । "

3- हिन्दी दिवस - भारत की संविधान निर्मात्री सभा ने 14 सितम्बर , 1949 को निर्णय लिया कि हिंदी भारत संघ की राजभाषा होगी । तब से प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है !


छंद    (Chhand)
                    
छंद -  अक्षरों की संख्या एवं क्रम ,मात्रा गणना तथा यति -गति के सम्बद्ध विशिष्ट नियमों से नियोजित पघरचना ' छंद ' कहलाती है ! 


छंद के अंग इस प्रकार है - 


1 . चरण - छंद में प्राय: चार चरण होते हैं ! पहले और तीसरे चरण को विषम चरण तथा दूसरे और चौथे चरण को सम चरण कहा जाता है ! 

2 . मात्रा और वर्ण - मात्रिक छंद में मात्राओं को गिना जाता है ! और वार्णिक छंद में वर्णों को !  दीर्घ स्वरों के उच्चारण में ह्वस्व स्वर की तुलना में दुगुना समय लगता है ! ह्वस्व स्वर की एक मात्रा एवं दीर्घ स्वर की दो मात्राएँ गिनी जाती हैं ! वार्णिक छंदों में वर्णों की गिनती की जाती है !

3 . लघु एवं गुरु - छंद शास्त्र में ये दोनों वर्णों के भेद हैं ! ह्वस्व को लघु वर्ण एवं दीर्घ को गुरु वर्ण कहा जाता है ! ह्वस्व अक्षर का चिन्ह ' । ' है ! जबकि दीर्घ का चिन्ह  ' s ' है !         

= लघु - अ ,इ ,उ एवं चन्द्र बिंदु वाले वर्ण लघु गिने जाते हैं ! 

= गुरु - आ ,ई ,ऊ ,ऋ ,ए ,ऐ ,ओ ,औ ,अनुस्वार ,विसर्ग युक्त वर्ण गुरु होते हैं ! संयुक्त वर्ण के पूर्व का लघु वर्ण भी गुरु गिना जाता है ! 

4 . संख्या और क्रम - मात्राओं एवं वर्णों की गणना को संख्या कहते हैं तथा लघु -गुरु के स्थान निर्धारण को क्रम कहते हैं ! 

5 . गण - तीन वर्णों का एक गण होता है ! वार्णिक छंदों में गणों की गणना की जाती है ! गणों की संख्या आठ है ! इनका एक सूत्र है - 

              ' यमाताराजभानसलगा '
                                     
इसके आधार पर गण ,उसकी वर्ण योजना ,लघु -दीर्घ आदि की जानकारी आसानी से हो जाती है ! 

      गण का नाम             उदाहरण           चिन्ह 

1 .  यगण                      यमाता              ISS

2    मगण                      मातारा             SSS

3 .  तगण                       ताराज             SSI

4 .  रगण                        राजभा            SIS

5 .  जगण                       जभान            ISI

6 .  भगण                       भानस            SII

7 .  नगण                       नसल              III

8 .  सगण                       सलगा            IIS

6. यति -गति -तुक -  यति का अर्थ विराम है , गति का अर्थ लय है ,और तुक का अर्थ अंतिम वर्णों की आवृत्ति है ! चरण के अंत में तुकबन्दी के लिए समानोच्चारित शब्दों का प्रयोग होता है ! जैसे - कन्त ,अन्त ,वन्त ,दिगन्त ,आदि तुकबन्दी वाले शब्द हैं , जिनका प्रयोग करके छंद की रचना की जा सकती है ! यदि छंद में वर्णों एवं मात्राओं का सही ढंग से प्रयोग प्रत्येक चरण से हुआ हो तो उसमें स्वत: ही ' गति ' आ जाती है ! 

- छंद के दो भेद है - 

1 . वार्णिक छंद - वर्णगणना के आधार पर रचा गया छंद वार्णिक छंद कहलाता है ! ये दो प्रकार के होते हैं - 
क . साधारण - वे वार्णिक छंद जिनमें 26 वर्ण तक के चरण होते हैं ! 
ख . दण्डक - 26 से अधिक वर्णों वाले चरण जिस वार्णिक छंद में होते हैं उसे दण्डक कहा जाता है ! घनाक्षरी में 31 वर्ण होते हैं अत: यह दण्डक छंद का उदाहरण है ! 

2 . मात्रिक छंद - मात्राओं की गणना पर आधारित छंद मात्रिक छंद कहलाते हैं ! यह गणबद्ध नहीं होता ।  दोहा और चौपाई मात्रिक छंद हैं ! 

प्रमुख छंदों का परिचय:

1 . चौपाई - यह मात्रिक सम छंद है। इसमें चार चरण होते हैं . प्रत्येक चरण में सोलह मात्राएँ होती हैं . पहले चरण की तुक दुसरे चरण से तथा तीसरे चरण की तुक चौथे चरण से मिलती है . प्रत्येक चरण के अंत में यति होती है। चरण के अंत में जगण (ISI) एवं तगण (SSI) नहीं होने चाहिए।  जैसे :

 I I  I I  S I   S I   I I   S I I    I I   I S I   I I   S I  I S I I
जय हनुमान ग्यान गुन सागर । जय कपीस तिहु लोक उजागर।।
राम दूत अतुलित बलधामा । अंजनि पुत्र पवन सुत नामा।। 
S I  SI   I I I I    I I S S     S I I   SI  I I I  I I   S S

2. दोहा - यह मात्रिक अर्द्ध सम छंद है। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में 13 मात्राएँ और द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 11 मात्राएँ होती हैं . यति चरण में अंत में होती है . विषम चरणों के अंत में जगण (ISI) नहीं होना चाहिए तथा सम चरणों के अंत में लघु होना चाहिए। सम चरणों में तुक भी होनी चाहिए। जैसे - 

 S  I I  I I I   I S I  I I    I I   I I   I I I   I S I
 श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि ।
 बरनउं रघुवर विमल जस, जो दायक फल चारि ।। 
 I I I I  I I I I  I I I    I I    S  S I I   I I   S I

3. सोरठा - यह मात्रिक अर्द्धसम छंद है !इसके विषम चरणों में 11मात्राएँ एवं सम चरणों में 13 मात्राएँ होती हैं ! तुक प्रथम एवं तृतीय चरण में होती है ! इस प्रकार यह दोहे का उल्टा छंद है ! 
जैसे - 

SI  SI   I I  SI    I S  I I I   I I S I I I 
कुंद इंदु सम देह , उमा रमन करुनायतन । 
जाहि दीन पर नेह , करहु कृपा मर्दन मयन ॥ 
 S I  S I  I I  S I    I I I  I S  S I I  I I I   

4. कवित्त - वार्णिक समवृत्त छंद जिसमें 31 वर्ण होते हैं ! 16 - 15 पर यति तथा अंतिम वर्ण गुरु होता है ! जैसे - 

सहज विलास हास पियकी हुलास तजि , = 16  मात्राएँ 
दुख के  निवास  प्रेम  पास  पारियत है !  = 15 मात्राएँ 

कवित्त को घनाक्षरी भी कहा जाता है ! कुछ लोग इसे मनहरण भी कहते हैं ! 

5 . गीतिका - मात्रिक सम छंद है जिसमें 26 मात्राएँ होती हैं ! 14 और 12 पर यति होती है तथा अंत में लघु -गुरु का प्रयोग है ! जैसे - 

मातृ भू सी मातृ भू है , अन्य से तुलना नहीं  । 

6 . द्रुत बिलम्बित - वार्णिक समवृत्त छंद में कुल 12 वर्ण होते हैं ! नगण , भगण , भगण,रगण का क्रम रखा जाता है !  जैसे - 

न जिसमें कुछ पौरुष हो यहां 
सफलता वह पा सकता कहां  ? 

7 . इन्द्रवज्रा - वार्णिक समवृत्त , वर्णों की संख्या 11 प्रत्येक चरण में दो तगण ,एक जगण और दो गुरु वर्ण । जैसे - 

होता उन्हें केवल धर्म प्यारा ,सत्कर्म ही जीवन का सहारा  । 

8 . उपेन्द्रवज्रा - वार्णिक समवृत्त छंद है ! इसमें वर्णों की संख्या प्रत्येक चरण में 11 होती है । गणों का क्रम है - जगण , तगण ,जगण और दो गुरु । जैसे - 

बिना विचारे जब काम होगा ,कभी न अच्छा परिणाम होगा । 

9 . मालिनी - वार्णिक समवृत्त है , जिसमें 15 वर्ण होते हैं ! 7 और 8 वर्णों के बाद यति होती है। 
गणों का क्रम नगण ,नगण, भगण ,यगण ,यगण । जैसे - 

पल -पल जिसके मैं पन्थ को देखती थी  । 
निशिदिन जिसके ही ध्यान में थी बिताती  ॥ 

10 . मन्दाक्रान्ता - वार्णिक समवृत्त छंद में 17 वर्ण भगण, भगण, नगण ,तगण ,तगण और दो गुरु वर्ण के क्रम में होते हैं । यति 10 एवं 7 वर्णों पर होती है ! जैसे - 

कोई पत्ता नवल तरु का पीत जो हो रहा हो  । 
तो प्यारे के दृग युगल के सामने ला उसे ही  । 
धीरे -धीरे सम्भल रखना औ उन्हें यों बताना  । 
पीला होना प्रबल दुःख से प्रेषिता सा हमारा  ॥ 

11 . रोला - मात्रिक सम छंद है , जिसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती  हैं तथा 11 और 13 पर यति होती है ! प्रत्येक चरण के अंत में दो गुरु या दो लघु वर्ण होते हैं ! दो -दो चरणों में तुक आवश्यक है ! जैसे - 

 I I   I I   SS   I I I    S I    S S I   I I I  S 
नित नव लीला ललित ठानि गोलोक अजिर में । 
रमत राधिका संग रास रस रंग रुचिर में ॥ 
I I I   S I S   SI   SI  I I  SI  I I I  S     


12 . बरवै - यह मात्रिक अर्द्धसम छंद है जिसके विषम चरणों में 12 और सम चरणों में 7 मात्राएँ होती हैं ! यति प्रत्येक चरण के अन्त में होती है ! सम चरणों के अन्त में जगण या तगण होने से बरवै की मिठास बढ़ जाती है ! जैसे - 

S I   SI   I  I   S I I     I S  I S I
वाम अंग शिव शोभित , शिवा उदार । 
सरद सुवारिद में जनु , तड़ित बिहार ॥ 
I I I  I S I I   S  I I    I I I   I S I      

13 . हरिगीतिका - यह मात्रिक सम छंद हैं ! प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं ! यति 16    और 12 पर होती है तथा अंत में लघु और गुरु का प्रयोग होता है ! जैसे - 

कहते हुए यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए । 
हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए ॥ 
 I I   S  IS   S  SI  S S  S  IS  S I I   IS

14. छप्पय - यह मात्रिक विषम छंद है ! इसमें छ: चरण होते हैं - प्रथम चार चरण रोला के अंतिम दो चरण उल्लाला के ! छप्पय में उल्लाला के सम -विषम चरणों का यह योग 15 + 13 = 28 मात्राओं वाला अधिक प्रचलित है ! जैसे - 

I S  I S I    I S I   I  I I S  I I  S  I I  S
रोला की पंक्ति (ऐसे चार चरण ) - जहां स्वतन्त्र विचार न बदलें मन में मुख में उल्लाला की पंक्ति (ऐसे दो चरण ) - सब भांति सुशासित हों जहां , समता के सुखकर नियम  । 
I I   S I   I S I I    S   I S    I I S  S   I I I I   I I I 

15. सवैया - वार्णिक समवृत्त छंद है ! एक चरण में 22 से लेकर 26 तक वर्ण होते हैं ! इसके कई भेद हैं ! जैसे - 

(1) मत्तगयंद (2)  सुन्दरी सवैया (3)  मदिरा सवैया  (4)  दुर्मिल सवैया  (5)  सुमुखि सवैया   (6)किरीट सवैया (7)  गंगोदक सवैया (8)  मानिनी सवैया  (9)  मुक्तहरा सवैया (10)  बाम सवैया  (11)  सुखी सवैया (12)  महाभुजंग प्रयात  

यहाँ मत्तगयंद सवैये का उदाहरण प्रस्तुत है - 

सीख पगा न झगा तन में प्रभु जाने को आहि बसै केहि ग्रामा  । 
धोती फटी सी लटी दुपटी अरु पांव उपानह की नहिं सामा  ॥ 
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक रहयो चकिसो वसुधा अभिरामा  । 
पूछत दीन दयाल को धाम बतावत आपन नाम सुदामा  ॥  

यहाँ ' को ' शब्द को ह्वस्व पढ़ा जाएगा तथा उसकी मात्रा भी एक ही गिनी जाती है ! मत्तगयंद सवैये में 23 अक्षर होते हैं ! प्रत्येक चरण में सात भगण ( SII ) और अंत में दो गुरु वर्ण होते हैं तथा चारों चरण तुकान्त होते हैं ! 

16. कुण्डलिया - मात्रिक विषम संयुक्त छंद है जिसमें छ: चरण होते हैं! इसमें एक दोहा और एक रोला होता है ! दोहे का चौथा चरण रोला के प्रथम चरण में दुहराया जाता है तथा दोहे का प्रथम शब्द ही रोला के अंत में आता है ! इस प्रकार कुण्डलिया का प्रारम्भ जिस शब्द से होता है उसी से इसका अंत भी होता है ! जैसे - 

SS   I I S  S I  S   I I S  I  SS  S I
सांई अपने भ्रात को ,कबहुं न दीजै त्रास  । 
पलक दूरि नहिं कीजिए , सदा राखिए पास  ॥ 
सदा राखिए पास , त्रास कबहुं नहिं दीजै  । 
त्रास दियौ लंकेश ताहि की गति सुनि लीजै  ॥ 
कह गिरिधर कविराय राम सौं मिलिगौ जाई  । 
पाय विभीषण राज लंकपति बाज्यौ सांई  ॥ 
S I   I S I I   S I  S I I I    S S   S S     


धातु - क्रिया के मूल रूप को धातु कहते हैं !जैसे - पढ़ , लिख , आ ,खा , जा , सो , हंस ! 'पढ़' धातु  से अनेक क्रिया रूप बनते हैं ! जैसे -पढ़ा , पढ़ता है , पढ़ना , पढ़ा था ,पढ़िए ! इनमें पढ़ एक ऐसा अंश है , जो सभी रूपों में मिल रहा है ! इस  समान रूप से मिलने वाले अंश को धातु या क्रिया धातुकहते हैं !


धातु के भेद इस प्रकार हैं - 


1. सामान्य ( मूल ) धातु -  सामान्य , मूल या रूढ़ क्रिया धातुएं रूढ़ शब्द के रूप में प्रचलित हैं! यौगिक अथवा व्युत्पन्न न होने के कारण ही इन्हें सामान्य या सरल धातुएं भी कहते हैं ;
    जैसे - सुनना , खेलना , लिखना , जाना , खाना आदि !


2. व्युत्पन्न धातु -  जो धातुएं किसी मूल धातु में प्रत्यय लगा कर अथवा मूल धातु को किसी अन्य प्रकार से बदलकर बनाई जाती हैं , उन्हें व्युत्पन्न धातुएं कहते हैं ! जैसे -


    मूल रूप      व्युत्पन्न धातु ( प्रेरणार्थक )              व्युत्पन्न ( अकर्मक )

1.  काटना              कटवाना                                             कटना 

2.  खाना                 खिलाना                                        खिलवाना                         

3.  खोलना             खुलवाना                                             खुलना 

-  मूल धातुएं अकर्मक होती हैं , या सकर्मक ! मूल अकर्मक धातुओं से प्रेरणार्थक अथवा  सकर्मक धातुएं व्युत्पन्न होती हैं !


3.  नाम धातु -  संज्ञा , सर्वनाम और विशेषण शब्दों के पीछे प्रत्यय लगाकर जो क्रिया धातुएं बनती हैं , उन्हें नाम धातु क्रिया कहते हैं , जैसे -


-  संज्ञा शब्दों से - लाज से लजाना , बात से बतियाना !  हिनहिन सेहिनहिनाना ,  
-  विशेषण शब्दों से -  गर्म से गर्माना , मोटा से मुटाना  !

-  सर्वनाम से -    अपना से अपनाना  !

4.  मिश्र धातु -  जिन संज्ञा , विशेषण और क्रिया विशेषण शब्दों के बाद  'करना '  यह होना जैसे क्रिया पदों के प्रयोग से जो नई क्रिया धातुएं बनती हैं , उन्हें मिश्र धातुएं कहते हैं 

1.  होना या करना  - काम करना , काम होना !


2.  देना -  धन देना , उधार देना !

3.  खाना  -  मार खाना , हवा खाना !

4.  मारना -  गोता मारना , डींग मारना !

5.  लेना -  जान लेना , खा लेना !


6.  जाना -  पी जाना , सो जाना !

7.  आना -  याद आना , नजर आना !

5-  अनुकरणात्मक धातु -  जो धातुएं किसी ध्वनि के अनुकरण पर बनाई जाती हैं , अनुकरणात्मक धातुएं कहते हैं ! जैसे - 
     टनटन - टनटनाना , चटकना , पटकना , खटकना धातुएं भी अनुकरणात्मक धातुओं के अंतर्गत आती हैं !      


भाषा के दो भेद हैं : -

1- मौखिक 

2- लिखित 

मौखिक रूप भाषा का अस्थायी रूप है लेकिन लिखित रूप स्थायी है !

लिपि - ध्वनियों को अंकित करने के लिए निश्चित किए गए प्रतीक चिन्हों की व्यवस्था को लिपि कहते है ! लिखित रूप भाषा को मानकता प्रदान करता है ! समाज को एक दूसरे से जोड़ने  में भाषा के लिखित रूप का महत्वपूर्ण योगदान है ! 

हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी लिपि है !

भाषा परिवार - भारत में दो भाषा परिवार अधिकांशत: प्रचलित है -

1- भारत यूरोपीय परिवार - उत्तर भारत में बोली जाने वाली भाषाएं ।

2- द्रविड़ भाषा परिवार - तमिल , तेलगू , मलयालम , कन्नड़ ।

बोली - भाषा के सीमित क्षेत्रीय रूप को बोली कहते हैं। एक भाषा के अंतर्गत कई बोलियाँ हो सकती हैं । जबकि एक बोली में कई भाषाएँ नहीं होती ! जिस रूप में आज हिंदी भाषा बोली व समझी जाती है वह खड़ी बोली का ही साहित्यिक भाषा रूप है ! 13 वीं -14 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अमीर खुसरो ने पहली बार खड़ी बोली में कविता रची ! ब्रजभाषा को सूरदास ने , अवधी को तुलसीदास ने और मैथिली को विधापति ने चरमोत्कर्ष पर  पहुँचाया !

हिंदी का क्षेत्र उत्तर भारत में हिमाचल प्रदेश ,हरियाणा , उत्तरांचल , उत्तरप्रदेश , बिहार ,झारखंड , छत्तीसगढ़ , मध्यप्रदेश ,राजस्थान , दिल्ली तथा दक्षिण में अंडमान निकोबार द्वीप समूह तक है ! इसके अलावा पंजाब ,महाराष्ट्र , गुजरात ,बंगाल आदि भागों में सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त होती है !

हिंदी की बोलियाँ =

1- पूर्वी हिंदी - इसका विकास अर्धमागधी अपभ्रंश से हुआ । इसके अंतर्गत अवधी , बघेली व छत्तीसगढ़ी बोलियाँ आती है । अवधी में तुलसीदास ने प्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस व जायसी ने पदमावत की रचना की ! 

2- पश्चिमी हिंदी = इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ । इसके अंतर्गत ब्रजभाषा , खड़ी बोली , हरियाणवी , बुंदेली और कन्नौजी आती है। ब्रजभाषा का क्षेत्र मथुरा , अलीगढ़ के पास है । सूरदास ने इसे चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया ।  खड़ी बोली दिल्ली , मेरठ , बिजनौर , मुजफ्फरनगर , रामपुर ,मुरादाबाद और सहारनपुर के आसपास बोली जाती थी ।  बुन्देली का क्षेत्र झाँसी , ग्वालियर व बुन्देलखण्ड के आसपास है । कन्नौजी क्षेत्र कन्नौज , कानपुर , पीलीभीत आदि । हिसार ,जींद ,रोहतक ,करनाल आदि जिलों में बांगरू भाषा बोली जाती है ! 

3- राजस्थानी हिंदी - इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ । इसके अंतर्गत मेवाड़ी ,मेवाती, मारवाड़ी और हाडौती बोलियाँ है । मेवाड़ी क्षेत्र मेवाड़ के आसपास है । मारवाड़ी का क्षेत्र जोधपुर , अजमेर , जैसलमेर ,बीकानेर  आदि है । मेवाती का क्षेत्र उत्तरी राजस्थान ,अलवर ,भरतपुर तथा हरियाणा में गुडगाँव के आसपास है । हाडौती राजस्थान के पूर्वी भाग व जयपुर के आसपास की बोली है !

4- बिहारी - इसके अंतर्गत भोजपुरी , मगही व मैथिली बोलियाँ है । भोजपुरी का क्षेत्र भोजपुर , बनारस ,जौनपुर ,मिर्जापुर ,बलिया ,गोरखपुर ,चम्पारन आदि तक है । मगही का क्षेत्र पटना, गया , हजारीबाग ,मुंगेर व भागलपुर के आसपास की बोली है । मैथिली का क्षेत्र मिथिला ,दरभंगा , मुजफ्फरपुर , पूर्णिया तथा मुंगेर में बोली जाती है । अब मैथिली को आठवीं अनुसूची में एक अलग भाषा के रूप में मान्यता दे दी गई है !

5- पहाड़ी - इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है । इसकी प्रमुख बोलियाँ गढवाली , कुमायूँनी , नेपाली हैं ! 


अलंकार -  " काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्व अलंकार कहे जाते हैं ! "

अलंकार के तीन भेद हैं - 


1. शब्दालंकार -  ये शब्द पर आधारित होते हैं ! प्रमुख शब्दालंकार हैं -  अनुप्रास , यमक , शलेष , पुनरुक्ति , वक्रोक्ति  आदि !

2. अर्थालंकार -  ये अर्थ पर आधारित होते हैं !  प्रमुख अर्थालंकार हैं -  उपमा , रूपक , उत्प्रेक्षा, प्रतीप , व्यतिरेक , विभावना , विशेषोक्ति ,अर्थान्तरन्यास , उल्लेख , दृष्टान्त, विरोधाभास , भ्रांतिमान  आदि !

3.उभयालंकार- उभयालंकार शब्द और अर्थ दोनों पर आश्रित रहकर दोनों को चमत्कृत करते हैं!

1- उपमा - जहाँ गुण , धर्म या क्रिया के आधार पर उपमेय की तुलना उपमान से की जाती है   
     जैसे - 
              हरिपद कोमल कमल से  ।

हरिपद ( उपमेय )की तुलना कमल ( उपमान ) से कोमलता के कारण की गई ! अत: उपमा अलंकार है !

2-  रूपक - जहाँ उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप किया जाता है ! जैसे -

                   अम्बर पनघट में डुबो रही ताराघट उषा नागरी  ।

आकाश रूपी पनघट में उषा रूपी स्त्री तारा रूपी घड़े डुबो रही है ! यहाँ आकाश पर पनघट का , उषा पर स्त्री का और तारा पर घड़े का आरोप होने से रूपक अलंकार है !

3- उत्प्रेक्षा - उपमेय में उपमान की कल्पना या सम्भावना होने पर उत्प्रेक्षा अलंकार होता है ! 
     जैसे - 
                मुख मानो चन्द्रमा है ।

यहाँ मुख ( उपमेय ) को चन्द्रमा ( उपमान ) मान लिया गया है ! यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है !
इस अलंकार की पहचान मनु , मानो , जनु , जानो शब्दों से होती है !

4- यमक - जहाँ कोई शब्द एक से अधिक बार प्रयुक्त हो और उसके अर्थ अलग -अलग हों वहाँ यमक अलंकार होता है ! जैसे -

                      सजना है मुझे सजना के लिए  ।

यहाँ पहले सजना का अर्थ है - श्रृंगार करना और दूसरे सजना का अर्थ - नायक शब्द दो बार प्रयुक्त है ,अर्थ अलग -अलग हैं ! अत: यमक अलंकार है !

5- शलेष - जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो , किन्तु प्रसंग भेद में उसके अर्थ एक से अधिक हों , वहां शलेष अलंकार है ! जैसे -

              रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून  ।
              पानी गए न ऊबरै मोती मानस चून  ।।

यहाँ पानी के तीन अर्थ हैं - कान्ति , आत्म - सम्मान  और जल  ! अत: शलेष अलंकार है , क्योंकि पानी शब्द एक ही बार प्रयुक्त है तथा उसके अर्थ तीन हैं !

6- विभावना - जहां कारण के अभाव में भी कार्य हो रहा हो , वहां विभावना अलंकार है !जैसे -

                        बिनु पग चलै सुनै बिनु काना 

वह ( भगवान ) बिना पैरों  के चलता है और बिना कानों के सुनता है ! कारण के अभाव में कार्य होने से यहां विभावना अलंकार है !

7- अनुप्रास -  जहां किसी  वर्ण की अनेक बार क्रम से आवृत्ति  हो वहां अनुप्रास अलंकार होता है ! जैसे - 

                    भूरी -भूरी भेदभाव भूमि से भगा दिया  । 

' भ ' की आवृत्ति  अनेक बार होने से यहां अनुप्रास अलंकार है !

8- भ्रान्तिमान - उपमेय में उपमान की भ्रान्ति होने से और तदनुरूप क्रिया होने से भ्रान्तिमान अलंकार होता है ! जैसे -

नाक का मोती अधर की कान्ति से , बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से,  
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है,  सोचता है अन्य शुक यह कौन है ?

यहां नाक में तोते का और दन्त  पंक्ति में अनार के दाने का भ्रम हुआ है , यहां भ्रान्तिमान अलंकार है !

9- सन्देह - जहां उपमेय के लिए  दिए गए उपमानों में सन्देह बना रहे तथा निशचय न हो सके, वहां सन्देह अलंकार होता है !जैसे -

          सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है ।
          सारी ही की नारी है कि नारी की ही सारी है 

10- व्यतिरेक - जहां कारण बताते हुए उपमेय की श्रेष्ठता उपमान से बताई गई हो , वहां व्यतिरेक अलंकार होता है !जैसे -

          का सरवरि तेहिं देउं मयंकू । चांद कलंकी वह निकलंकू ।।

मुख की समानता चन्द्रमा से कैसे दूं ? चन्द्रमा में तो कलंक है , जबकि मुख निष्कलंक है !

11- असंगति - कारण और कार्य में संगति न होने पर असंगति अलंकार होता है ! जैसे -

                      हृदय घाव मेरे पीर रघुवीरै ।

घाव तो लक्ष्मण के हृदय में हैं , पर पीड़ा राम को है , अत: असंगति अलंकार है !

12- प्रतीप - प्रतीप का अर्थ है उल्टा या विपरीत । यह उपमा अलंकार के विपरीत होता है । क्योंकि इस अलंकार में उपमान को लज्जित , पराजित या हीन दिखाकर उपमेय की श्रेष्टता बताई जाती है ! जैसे - 

               सिय मुख समता किमि करै चन्द वापुरो रंक ।

सीताजी के मुख ( उपमेय )की तुलना बेचारा चन्द्रमा ( उपमान )नहीं कर सकता । उपमेय की श्रेष्टता प्रतिपादित होने से यहां प्रतीप अलंकार है !

13- दृष्टान्त - जहां उपमेय , उपमान और साधारण धर्म का बिम्ब -प्रतिबिम्ब भाव होता है,जैसे-
             बसै बुराई जासु तन ,ताही को सन्मान ।
             भलो भलो कहि छोड़िए ,खोटे ग्रह जप दान ।।

यहां पूर्वार्द्ध में उपमेय वाक्य और उत्तरार्द्ध में उपमान वाक्य है ।इनमें ' सन्मान होना ' और ' जपदान करना ' ये दो भिन्न -भिन्न धर्म कहे गए हैं । इन दोनों में बिम्ब -प्रतिबिम्ब भाव है । अत: दृष्टान्त अलंकार है ! 

14- अर्थान्तरन्यास - जहां सामान्य कथन का विशेष से या विशेष कथन का सामान्य से समर्थन किया जाए , वहां अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है ! जैसे -

              जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग ।
              चन्दन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग ।।

15- विरोधाभास - जहां वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास मालूम पड़े , वहां विरोधाभास अलंकार होता है ! जैसे -

              या अनुरागी चित्त की गति समझें नहीं कोइ ।
              ज्यों -ज्यों बूडै स्याम रंग त्यों -त्यों उज्ज्वल होइ ।।

यहां स्याम रंग में डूबने पर भी उज्ज्वल होने में विरोध आभासित होता है , परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । अत: विरोधाभास अलंकार है ! 

16- मानवीकरण - जहां जड़ वस्तुओं या प्रकृति पर मानवीय चेष्टाओं का आरोप किया जाता है , वहां मानवीकरण अलंकार है ! जैसे -

              फूल हंसे कलियां मुसकाई ।

यहां फूलों का हंसना , कलियों का मुस्कराना मानवीय चेष्टाएं हैं , अत: मानवीकरण अलंकार है!

17- अतिशयोक्ति - अतिशयोक्ति का अर्थ है - किसी बात को बढ़ा -चढ़ाकर कहना । जब काव्य में कोई बात बहुत बढ़ा -चढ़ाकर कही जाती है तो वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है !जैसे -

                           लहरें व्योम चूमती उठतीं ।

यहां लहरों को आकाश चूमता हुआ दिखाकर अतिशयोक्ति का विधान किया गया है !

18- वक्रोक्ति - जहां किसी वाक्य में वक्ता के आशय से भिन्न अर्थ की कल्पना की जाती है , वहां वक्रोक्ति अलंकार होता है !    
    - इसके दो भेद होते हैं - (1 ) काकु वक्रोक्ति   (2) शलेष वक्रोक्ति  ।   

1- काकु वक्रोक्ति - वहां होता है जहां वक्ता के कथन का कण्ठ ध्वनि के कारण श्रोता भिन्न अर्थ लगाता है । जैसे -

              मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू ।

2- शलेष वक्रोक्ति - जहां शलेष के द्वारा वक्ता के कथन का भिन्न अर्थ लिया जाता है ! जैसे -

              को तुम हौ इत आये कहां घनस्याम हौ तौ कितहूं बरसो ।
              चितचोर कहावत हैं हम तौ तहां जाहुं जहां धन है सरसों ।।

19- अन्योक्ति - अन्योक्ति का अर्थ है अन्य के प्रति कही गई उक्ति । इस अलंकार में अप्रस्तुत के  माध्यम से प्रस्तुत का वर्णन किया जाता है ! जैसे -

             नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहि काल ।
             अली कली ही सौं बिध्यौं आगे कौन हवाल  ।।



यहां भ्रमर और कली का प्रसंग अप्रस्तुत विधान के रूप में है जिसके माध्यम से राजा जयसिंह को सचेत किया गया है , अत: अन्योक्ति अलंकार है !   



Hindi Idioms: हिंदी मुहावरे :

  1. अंगूठा दिखाना - मना कर देना 
  2. अक्ल सठियाना - बुद्धि भ्रष्ट होना 
  3. अंगूठे पर रखना - परवाह न करना 
  4. अपना उल्लू सीधा करना - अपना काम बना लेना 
  5. अपनी खिचड़ी अलग पकाना - सबसे अलग रहना 
  6. आँखों का तारा - बहुत प्यारा 
  7. आँखें बिछाना - स्वागत करना 
  8. आँखों में धूल झोंकना - धोखा देना 
  9. आग बबूला होना - अत्यधिक क्रोध करना 
  10. आस्तिन का सांप होना - कपटी मित्र 
  11. आँखें दिखाना - धमकाना 
  12. आसमान टूट पड़ना - अचानक मुसीबत आ जाना 
  13. आसमान पर दिमाग होना - अहंकारी होना 
  14. ईंट का जवाब पत्थर से देना - करारा जवाब देना 
  15. ईद का चाँद होना - बहुत कम दिखाई देना 
  16. ईंट से ईंट बजाना - ध्वस्त कर देना 
  17. उल्टे छुरे से मूंढ़ना - ठग लेना 
  18. उड़ती चिड़िया के पंख गिनना - अत्यन्त चतुर होना  
  19. ऊंट के मुंह में जीरा होना - अधिक खुराक वाले को कम देना 
  20. एड़ी चोटी का जोर लगाना - बहुत प्रयास करना 
  21. ओखली में सिर देना - जान बूझकर मुसीबत मोल लेना 
  22. औधी खोपड़ी का होना - बेवकूफ होना 
  23. कलेजा ठण्डा होना - शांत होना 
  24. कलेजे पर पत्थर रखना - दिल मजबूत करना 
  25. कलेजे पर सांप लोटना - अन्तर्दाह होना 
  26. कलेजा मुंह को आना -  घबरा जाना 
  27. काठ का उल्लू होना - मूर्ख होना 
  28. कान काटना - चतुर होना 
  29. कान खड़े होना - सावधान हो जाना 
  30. काम तमाम करना - मार डालना 
  31. कुएं में बांस डालना - बहुत खोजबीन करना 
  32. कलई खुलना - पोल खुलना 
  33. कलेजा फटना - दुःख होना 
  34. कीचड़ उछालना - बदनाम करना 
  35. खून खौलना - क्रोध आना 
  36. खून का प्यासा होना - प्राण लेने को तत्पर होना 
  37. खाक छानना - भटकना 
  38. खटाई में पड़ना - व्यवधान आ जाना 
  39. गाल बजाना - डींग हांकना 
  40. गूलर का फूल होना - दुर्लभ होना 
  41. गांठ बांधना - याद रखना 
  42. गुड़ गोबर कर देना - काम बिगाड़ देना 
  43. घाट -घाट का पानी पीना - अनुभवी होना 
  44. घी के दिए जलाना - प्रसन्न होना 
  45. घुटने टेकना - हार मानना 
  46. घड़ों पानी पड़ना - लजिज्त होना 
  47. चाँद का टुकड़ा होना - बहुत सुंदर होना 
  48. चिकना घड़ा होना - बात का असर न होना 
  49. चांदी काटना - अधिक लाभ कमाना 
  50. चांदी का जूता मारना - रिश्वत देना 
  51. छक्के छुड़ाना - परास्त कर देना 
  52. छप्पर फाड़कर देना - अनायास लाभ होना 
  53. छटी का दूध याद आना - अत्यधिक कठिन होना 
  54. छाती पर मूंग दलना - पास रहकर दिल दु:खाना 
  55. छूमन्तर होना - गायब हो जाना 
  56. छाती पर सांप लोटना - ईर्ष्या करना 
  57. जबान को लगाम देना - सोच समझकर बोलना 
  58. जान के लाले पड़ना - प्राण संकट में पड़ना 
  59. जी खट्टा होना - मन फिर जाना 
  60. जमीन पर पैर न रखना - अहंकार होना 
  61. जहर उगलना - बुराई करना 
  62. जान पर खेलना - प्राणों की बाजी लगाना 
  63. टेढ़ी खीर होना - कठिन कार्य 
  64. टांग अड़ाना - दखल देना 
  65. टें बोल जाना - मर जाना 
  66. ठकुर सुहाती कहना - खुशामद करना 
  67. डकार जाना - हड़प लेना 
  68. ढोल की पोल होना - खोखला होना 
  69. तीन तेरह होना - बिखर जाना 
  70. तलवार के घाट उतारना - मार डालना 
  71. थाली का बैगन होना - सिद्धांतहीन होना 
  72. दांत काटी रोटी होना - गहरी दोस्ती 
  73. दो -दो हाथ करना - लड़ना 
  74. धूप में बाल सफेद होना - अनुभव होना 
  75. धाक जमाना - प्रभावित करना 
  76. नाकों चने चबाना - बहुत सताना 
  77. नाक -भौं सिकोड़ना - अप्रसन्नता व्यक्त करना 
  78. पत्थर की लकीर होना - अमिट होना 
  79. पेट में दाढ़ी होना - कम उम्र में अधिक जानना 
  80. पौ बारह होना - खूब लाभ होना 
  81. कालानाग होना - बहुत घातक व्यक्ति 
  82. केर -बेर का संग होना - विपरीत मेल 
  83. धोंधा वसंत होना - मूर्ख व्यक्ति 
  84. घूरे के दिन फिरना - अच्छे दिन आना 
  85. चंडूखाने की बातें करना - झूठी बातें होना 
  86. चंडाल चौकड़ी - दुष्टों का समूह 
  87. छिछा लेदर करना - दुर्दशा करना 
  88. टिप्पस लगाना - सिफारिश करना 
  89. टेक निभाना - प्रण पूरा करना 
  90. तारे गिनना - नींद न आना 
  91. त्रिशंकु होना - अधर में लटकना 
  92. मजा चखाना - बदला लेना 
  93. मन मसोसना - विवश होना 
  94. हाथ पसारना - मांगना 
  95. हाथ मलना - पछताना 
  96. हालत पतली होना - दयनीय दशा होना 
  97. सेमल का फूल होना - थोडें दिनों का असितत्व होना 
  98. सब्जबाग दिखाना - झूठी आशा देना 
  99. भुजा उठाकर कहना - प्रतिज्ञा करना 
  100. हाथ के तोते उड़ना - घबरा जाना


Hindi Proverbs  - हिंदी की प्रमुख लोकोक्तियाँ :


1. अपनी करनी पार उतरनी = जैसा करना वैसा भरना


2. आधा तीतर आधा बटेर = बेतुका मेल
3. अधजल गगरी छलकत जाए = थोड़ी विद्या या थोड़े धन को पाकर वाचाल हो जाना
4. अंधों में काना राजा = अज्ञानियों में अल्पज्ञ की मान्यता होना
5. अपनी अपनी ढफली अपना अपना राग = अलग अलग विचार होना
6. अक्ल बड़ी या भैंस = शारीरिक शक्ति की तुलना में बौद्धिक शक्ति की श्रेष्ठता होना
7. आम के आम गुठलियों के दाम = दोहरा लाभ होना
8. अपने मुहं मियाँ मिट्ठू बनना = स्वयं की प्रशंसा करना
9. आँख का अँधा गाँठ का पूरा = धनी मूर्ख
10. अंधेर नगरी चौपट राजा = मूर्ख के राजा के राज्य में अन्याय होना
11. आ बैल मुझे मार = जान बूझकर लड़ाई मोल लेना
12. आगे नाथ न पीछे पगहा = पूर्ण रूप से आज़ाद होना
13. अपना हाथ जगन्नाथ = अपना किया हुआ काम लाभदायक होता है
14. अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत = पहले सावधानी न बरतना और बाद में पछताना
15. आगे कुआँ पीछे खाई = सभी और से विपत्ति आना
16. ऊंची दूकान फीका पकवान = मात्र दिखावा
17. उल्टा चोर कोतवाल को डांटे = अपना दोष दूसरे के सर लगाना
18. उंगली पकड़कर पहुंचा पकड़ना = धीरे धीरे साहस बढ़ जाना
19. उलटे बांस बरेली को = विपरीत कार्य करना
20. उतर गयी लोई क्या करेगा कोई = इज्ज़त जाने पर डर कैसा
21. ऊधौ का लेना न माधो का देना = किसी से कोई सम्बन्ध न रखना
22. ऊँट की चोरी निहुरे - निहुरे = बड़ा काम लुक - छिप कर नहीं होता
23. एक पंथ दो काज = एक काम से दूसरा काम
24. एक थैली के चट्टे बट्टे = समान प्रकृति वाले
25. एक म्यान में दो तलवार = एक स्थान पर दो समान गुणों या शक्ति वाले व्यक्ति साथ नहीं रह सकते
26. एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है = एक खराब व्यक्ति सारे समाज को बदनाम कर देता है
27. एक हाथ से ताली नहीं बजती = झगड़ा दोनों और से होता है
28. एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा = दुष्ट व्यक्ति में और भी दुष्टता का समावेश होना
29. एक अनार सौ बीमार = कम वस्तु , चाहने वाले अधिक
30. एक बूढ़े बैल को कौन बाँध भुस देय = अकर्मण्य को कोई भी नहीं रखना चाहता
31. ओखली में सर दिया तो मूसलों से क्या डरना = जान बूझकर प्राणों की संकट में डालने वाले प्राणों की चिंता नहीं करते
32. अंगूर खट्टे हैं = वस्तु न मिलने पर उसमें दोष निकालना
33. कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू  तेली = बेमेल एकीकरण
34. काला अक्षर भैंस बराबर = अनपढ़ व्यक्ति
35. कोयले की दलाली में मुहं काला = बुरे काम से बुराई मिलना
36. काम का न काज का दुश्मन अनाज का =  बिना काम किये बैठे बैठे खाना
37. काठ की हंडिया बार बार नहीं चढ़ती= कपटी व्यवहार हमेशा नहीं किया जा सकता
38. का बरखा जब कृषि सुखाने = काम बिगड़ने पर सहायता व्यर्थ होती है
39. कभी नाव गाड़ी पर कभी गाड़ी नाव पर = समय पड़ने पर एक दुसरे की मदद करना
40. खोदा पहाड़ निकली चुहिया = कठिन परिश्रम का तुच्छ परिणाम
41. खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे = अपनी शर्म छिपाने के लिए व्यर्थ का काम करना
42. खग जाने खग की ही भाषा = समान प्रवृति वाले लोग एक दुसरे को समझ पाते हैं
43. गंजेड़ी यार किसके, दम लगाई खिसके = स्वार्थ साधने के बाद साथ छोड़ देते हैं
44. गुड़ खाए गुलगुलों से परहेज = ढोंग रचना
45. घर की मुर्गी दाल बराबर = अपनी वस्तु का कोई महत्व नहीं
46. घर का भेदी लंका ढावे = घर का शत्रु  अधिक खतरनाक होता है
47. घर खीर तो बाहर भी खीर = अपना घर संपन्न हो तो बाहर भी सम्मान मिलता है
48. चिराग तले अँधेरा = अपना दोष स्वयं दिखाई नहीं देता
49. चोर की दाढ़ी में तिनका = अपराधी व्यक्ति सदा सशंकित रहता है
50. चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए = कंजूस होना
51. चोर चोर मौसेरे भाई = एक से स्वभाव वाले व्यक्ति
52. जल में रहकर मगर से बैर = स्वामी से शत्रुता नहीं करनी चाहिए
53. जाके पाँव न फटी बिवाई सो क्या जाने पीर पराई = भुक्तभोगी ही दूसरों का दुःख जान पाता है
54. थोथा चना बाजे घना = ओछा आदमी अपने महत्व का अधिक प्रदर्शन करता है
55. छाती पर मूंग दलना = कोई ऐसा काम होना जिससे आपको और दूसरों को कष्ट पहुंचे
56. दाल भात में मूसलचंद = व्यर्थ में दखल देना
57. धोबी का कुत्ता घर का न घाट का = कहीं का न रहना
58. नेकी और पूछ पूछ = बिना कहे ही भलाई करना
59. नीम हकीम खतरा ए जान = थोडा ज्ञान खतरनाक होता है
60. दूध का दूध पानी का पानी = ठीक ठीक न्याय करना
61. बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद = गुणहीन गुण को नहीं पहचानता
62. पर उपदेश कुशल बहुतेरे = दूसरों को उपदेश देना सरल है
63. नाम बड़े और दर्शन छोटे = प्रसिद्धि के अनुरूप गुण न होना
64. भागते भूत की लंगोटी सही = जो मिल जाए वही काफी है
65. मान न मान मैं तेरा मेहमान = जबरदस्ती गले पड़ना
66. सर मुंडाते ही ओले पड़ना = कार्य प्रारंभ होते ही विघ्न आना
67. हाथ कंगन को आरसी क्या = प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या जरूरत है
68. होनहार बिरवान के होत चिकने पात  = होनहार व्यक्ति का बचपन में ही पता चल जाता है
69. बद अच्छा बदनाम बुरा = बदनामी बुरी चीज़ है
70. मन चंगा तो कठौती में गंगा = शुद्ध मन से भगवान प्राप्त होते हैं
71. आँख का अँधा, नाम नैनसुख = नाम के विपरीत गुण होना
72. ईश्वर की माया, कहीं धूप कहीं छाया = संसार में कहीं सुख है तो कहीं दुःख है 
73. उतावला सो बावला = मूर्ख व्यक्ति जल्दबाजी में काम करते हैं 
74. ऊसर बरसे तृन नहिं जाए = मूर्ख पर उपदेश का प्रभाव नहीं पड़ता 
75. ओछे की प्रीति बालू की भीति = ओछे व्यक्ति से मित्रता टिकती नहीं है 
76. कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा = सिद्धांतहीन गठबंधन 
77. कानी के ब्याह में सौ जोखिम = कमी होने पर अनेक बाधाएं आती हैं 
78. को उन्तप होब ध्यहिंका हानी = परिवर्तन का प्रभाव न पड़ना 
79. खाल उठाए सिंह की स्यार सिंह नहिं होय = बाहरी रूप बदलने से गुण नहीं बदलते 
80. गागर में सागर भरना = कम शब्दों में अधिक बात करना 
81. घर में नहीं दाने , अम्मा चली भुनाने = सामर्थ्य से बाहर कार्य करना 
82. चौबे गए छब्बे बनने दुबे बनकर आ गए = लाभ के बदले हानि 
83. चन्दन विष व्याप्त नहीं लिपटे रहत भुजंग = सज्जन पर कुसंग का प्रभाव नहीं पड़ता 
84. जैसे नागनाथ वैसे सांपनाथ = दुष्टों की प्रवृति एक जैसी होना 
85. डेढ़ पाव आटा पुल पै रसोई = थोड़ी सम्पत्ति पर भारी दिखावा 
86. तन पर नहीं लत्ता पान खाए अलबत्ता = झूठी रईसी दिखाना 
87. पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं = पराधीनता में सुख नहीं है 
88. प्रभुता पाहि काहि मद नहीं = अधिकार पाकर व्यक्ति घमंडी हो जाता है 
89. मेंढकी को जुकाम = अपनी औकात से ज्यादा नखरे 
90. शौक़ीन बुढिया चटाई का लहंगा = विचित्र शौक 
91. सूरदास खलकारी का या चिदै न दूजो रंग = दुष्ट अपनी दुष्टता नहीं छोड़ता 
92. तिरिया तेल हमीर हठ चढ़े न दूजी बार = दृढ प्रतिज्ञ लोग अपनी बात पे डटे रहते हैं 
93. सौ सुनार की, एक लुहार की = निर्बल की सौ चोटों की तुलना में बलवान की एक चोट काफी है 
94. भई गति सांप छछूंदर केरी = असमंजस की स्थिति में पड़ना 
95. पुचकारा कुत्त सिर चढ़े = ओछे लोग मुहं लगाने पर अनुचित लाभ उठाते हैं 
96. मुहं में राम बगल में छुरी = कपटपूर्ण व्यवहार 
97. जंगल में मोर नाचा किसने देखा = गुण की कदर गुणवानों के बीच ही होती है 
98. चट मंगनी पट ब्याह = शुभ कार्य तुरंत संपन्न कर देना चाहिए 
99. ऊंट बिलाई लै गई तौ हाँजी-हाँजी कहना = शक्तिशाली की अनुचित बात का समर्थन करना 
100. तीन लोक से मथुरा न्यारी = सबसे अलग रहना





संज्ञा की परिभाषा  - संज्ञा को 'नाम' भी  कहा जाता है . किसी प्राणी , वस्तु , स्थान , भाव आदि का 'नाम' ही उसकी संज्ञा कही जाती है . 



उदाहरण के लिए निम्नलिखित वाक्य पढ़िए :

"राजेश (व्यक्ति) जब रेलगाड़ी (वस्तु) से शिमला (स्थान) गया तो उसे बहुतप्रसन्नता (भाव) हुई." इस वाक्य में 'राजेश', 'रेलगाड़ी', 'शिमला' और 'प्रसन्नता' सभी संज्ञा के उदाहरण हैं. 
संज्ञा तीन प्रकार की होती है.


१. व्यक्तिवाचक संज्ञा - जो किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु का बोध कराती है, यथा - सीता, युमना, आगरा. 

२. जातिवाचक संज्ञा  - जो संज्ञा किसी जाति का बोध कराती है, जातिवाचक संज्ञा कहलाती है.  यथा -नदी , पर्वत. 




३. भाववाचक संज्ञा  - किसी भाव , गुण, दशा आदि का बोध कराने वाले शब्द भाववाचक संज्ञा होते  है, यथा -मिठास , कालिमा.





पदबंध - जब एक से अधिक पद मिलकर एक व्याकरणिक इकाई का काम करते हैं , तब उस बंधी हुई इकाई को पदबंध कहते हैं ! जैसे -सबसे तेज दौड़ने वाला घोड़ा जीत गया !






पदबंध के पाँच भेद होते हैं - 

1- संज्ञा पदबंध - जब एक से अधिक पद मिलकर संज्ञा का काम करें ,तो उस पदबंध को संज्ञा पदबंध कहते हैं ! संज्ञा पदबंध के शीर्ष में संज्ञा पद होता है , अन्य सभी पद उस पर आश्रित होते हैं ! जैसे - 

   दीवार के पीछे खड़ा पेड़ गिर गया ।

इस वाक्य में रेखांकित शब्द संज्ञा पदबंध हैं !

2- सर्वनाम पदबंध - जब एक से अधिक पद एक साथ जुड़कर सर्वनाम का कार्य करें तो उसे सर्वनाम पदबंध कहते  हैं ! इसके शीर्ष में सर्वनाम पद होता है ! जैसे -

    भाग्य की मारी तुम अब कहाँ जाओगी  ।
3- विशेषण पदबंध - जब एक से अधिक पद मिलकर किसी संज्ञा की विशेषता प्रकट करें , उन्हें विशेषण पदबंध  कहते हैं ! इसके शीर्ष में विशेषण होता है ! अन्य पद उस विशेषण पर आश्रित होते हैं ! इसमें प्रमुखतया प्रविशेषण लगता है ! जैसे - 

    मुझे चार किलो पिसी हुई लाल मिर्च ला दो ।

4- क्रिया पदबंध - जब एक से अधिक क्रिया पद मिलकर एक इकाई के रूप में क्रिया का कार्य संपन्न करते हैं , वे क्रिया पदबंध कहलाते हैं ! इस पदबंध के शीर्ष में क्रिया होती है ! 
    जैसे - 
             वह पढ़कर सो गया है ।


5- क्रियाविशेषण पदबंध - जो पदबंध क्रियाविशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं , उन्हें क्रियाविशेषण पदबंध कहते हैं ! इसमें क्रियाविशेषण शीर्ष पर होता है और प्राय: प्रविशेषण आश्रित पद होते हैं ! जैसे - 



    मैं बहुत तेजी से दौड़कर गया ।



उपसर्ग - वे शब्दांश है जो किसी शब्द से पूर्व लगकर उस शब्द का अर्थ बदल देते है उन्हें उपसर्ग कहते हैं ! जैसे - 






1- संस्कृत उपसर्ग -


( उपसर्ग )                  ( उपसर्ग से निर्मित शब्द ) 

1. अति                        अतिशय , अत्याचार , अतिसार 

2. आ                          आजीवन , आकार , आजीविका  

3. परि                         परिमाप , परिचय , परिमाण 

4. नि                          निपुण , निगम , निबन्ध 

5. उप                          उपकार , उपमान , उपयोग 

2- हिन्दी के उपसर्ग 

   ( उपसर्ग )                    ( उपसर्ग से निर्मित शब्द )

1. अ                                अचेत , अमर , अशान्त 

2. अन                              अनमोल , अनजान , अनाचार 

3. भर                               भरसक , भरमार , भरपेट 

4. दु                                 दुबला , दुगना , दुसह 

5. उन                               उनासी , उनतीस , उनचास 

3- अरबी - फारसी के उपसर्ग 

  ( उपसर्ग )            (अर्थ )                 ( नवीन शब्द )

1. अल                 अलमस्त               अलबत्ता , अलबेला 

2. बद                   हीनता                  बदतमीज , बदबू 

3. कम                  अल्प                    कमजोर, कमसिन 

4. ब                     अनुसार                 बनाम , बदौलत 

5. हम                   साथ                     हमराज , हमसफर 

4- अंग्रेजी के उपसर्ग 

   ( उपसर्ग )               ( उपसर्ग से निर्मित शब्द )

1. हाफ                         हाफ पेण्ट , हाफ बाडी 

2. सब                          सब -पोस्टमास्टर , सब -इन्सपेक्टर 

3. चीफ                         चीफ मिनिस्टर 

4. जनरल                      जनरल मैनेजर 

5. हैड                           हैड मुंशी , हैड पंडित 

5- उपसर्ग की भाँति प्रयुक्त होने वाले अन्य अव्यय 

1. का / कु -  कापुरुष , कुपुत्र 

2. चिर -  चिरकाल , चिरायु 

3. सह -  सहचर , सहकर्मी 

4. अ / अन -  अनीति , अधर्म , अनन्त 



5. अन्तर -  अन्तर्नाद , अन्तर्ध्यान 



कारक 


जो किसी शब्द का क्रिया के  साथ सम्बन्ध बताए  वह कारक है !




कारक के आठ भेद हैं :-

जिनका विवरण इस  प्रकार है :-

 कारक                                                             कारक चिन्ह 

1. कर्ता                                                              ने 

2. कर्म                                                               को 

3. करण                                                             से , के द्वारा 

4. सम्प्रदान                                                        को , के लिए 

5. अपादान                                                         से (अलग करना )  

6. सम्बन्ध                                                         का , की , के 

7. अधिकरण                                                      में , पर 



8. सम्बोधन                                                        हे , अरे                                                                                               
नीचे कारकों के कुछ उदाहरण दिए गए हैं :

कर्ता :

राजेश ने पानी पिया। 
सीता ने गाना गाया। 

कर्म :

पिता ने बच्चे को गोद में उठा लिया। 
रमेश ने सुरेश को हरा दिया। 

करण :

वह ठण्ड से कांप रहा था
सीता कलम से लिखती है

सम्प्रदान :

यह पुस्तक गीता को दे दो
उसने देश के लिए जान  दे दी

अपादान :

पत्ते पेड़ से टूट कर गिरते हैं
वह धीरे धीरे सब से दूर हो गया

सम्बन्ध :


मैं आज हरीश की माता से मिला

श्याम का आत्मविश्वास बढ़ता ही गया

अधिकरण :

वहां कमरे में कोई नहीं था
यह दूध वहां मेज़ पर रख दो

सम्बोधन :

हे अर्जुन ! तुम्हें यह लड़ाई लड़नी ही होगी
अरे ! ये तो वही है जिसे तुम खोज रहे थे














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