विराम चिन्ह
1. पूर्ण विराम :- ( । )
समास के छ: भेद हैं -
संधि तीन प्रकार की होती हैं :-
भाषा में स्थान -विशेष पर रुकने अथवा उतार -चढ़ाव आदि दिखाने के लिए जिन चिन्हों का प्रयोग किया जाता है उन्हें ही ' विराम चिन्ह' कहते है !
1. पूर्ण विराम :- ( । )
- प्रत्येक वाक्य की समाप्ति पर इस चिन्ह का प्रयोग किया जाता है !
2. उपविराम :- ( : )
- उपविराम का प्रयोग संवाद -लेखन एकांकी लेखन या नाटक लेखन में वक्ता के नाम के बाद किया जाता है !
3. अर्ध विराम :- ( ; )
- इसमें उपविराम से भी कम ठहराव होता है ! यदि खंडवाक्य का आरंभ वरन, पर , परन्तु , किन्तु , क्योंकि इसलिए , तो भी आदि शब्दों से हो तो उसके पहले इसका प्रयोग करना चाहिए !
4. अल्प विराम :- ( , )
- इसमें बहुत कम ठहराव होता है !
5. प्रश्नबोधक :- ( ? )
6. विस्मयादिबोधक :- ( ! )
- विस्मय , हर्ष , शोक , घृणा , प्रेम आदि भावों को प्रकट करने वाले शब्दों के आगे इसका प्रयोग होता है !
7. निर्देशक चिन्ह :- ( _ )
8. योजक चिन्ह :- ( - )
- द्वन्द्व समास के दो पदों के बीच , सहचर शब्दों के बीच प्रयोग !
9. कोष्ठक चिन्ह :- ( )
10. उदधरण चिन्ह :- ( " " )
11. लाघव चिन्ह :- ( o )
12. विवरण चिन्ह :- ( :- )
समास -
दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से नए शब्द बनाने की क्रिया को समास कहते हैं !
सामासिक पद को विखण्डित करने की क्रिया को विग्रह कहते हैं !
समास के छ: भेद हैं -
1- अव्ययीभाव समास - जिस समास में पहला पद प्रधान होता है तथा समस्त पद अव्यय का काम करता है , उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं !जैसे -
( सामासिक पद ) ( विग्रह )
1. यथावधि अवधि के अनुसार
2. आजन्म जन्म पर्यन्त
3. प्रतिदिन दिन -दिन
4. यथाक्रम क्रम के अनुसार
5. भरपेट पेट भरकर
2- तत्पुरुष समास - इस समास में दूसरा पद प्रधान होता है तथा विभक्ति चिन्हों का लोप हो जाता है ! तत्पुरुष समास के छ: उपभेद विभक्तियों के आधार पर किए गए हैं -
1. कर्म तत्पुरुष
2. करण तत्पुरुष
3. सम्प्रदान तत्पुरुष
4. अपादान तत्पुरुष
5. सम्बन्ध तत्पुरुष
6. अधिकरण तत्पुरुष
- उदाहरण इस प्रकार हैं -
( सामासिक पद ) ( विग्रह ) ( समास )
1. कोशकार कोश को करने वाला कर्म तत्पुरुष
2. मदमाता मद से माता करण तत्पुरुष
3. मार्गव्यय मार्ग के लिए व्यय सम्प्रदान तत्पुरुष
4. भयभीत भय से भीत अपादान तत्पुरुष
5. दीनानाथ दीनों के नाथ सम्बन्ध तत्पुरुष
6. आपबीती अपने पर बीती अधिकरण तत्पुरुष
3- कर्मधारय समास - जिस समास के दोनों पदों में विशेष्य - विशेषण या उपमेय - उपमान सम्बन्ध हो तथा दोनों पदों में एक ही कारक की विभक्ति आये उसे कर्मधारय समास कहते हैं ! जैसे :-
( सामासिक पद ) ( विग्रह )
1. नीलकमल नीला है जो कमल
2. पीताम्बर पीत है जो अम्बर
3. भलामानस भला है जो मानस
4. गुरुदेव गुरु रूपी देव
5. लौहपुरुष लौह के समान ( कठोर एवं शक्तिशाली ) पुरुष
4- बहुब्रीहि समास - अन्य पद प्रधान समास को बहुब्रीहि समास कहते हैं !इसमें दोनों पद किसी अन्य अर्थ को व्यक्त करते हैं और वे किसी अन्य संज्ञा के विशेषण की भांति कार्य करते हैं ! जैसे -
( सामासिक पद ) ( विग्रह )
1. दशानन दश हैं आनन जिसके ( रावण )
2. पंचानन पांच हैं मुख जिनके ( शंकर जी )
3. गिरिधर गिरि को धारण करने वाले ( श्री कृष्ण )
4. चतुर्भुज चार हैं भुजायें जिनके ( विष्णु )
5. गजानन गज के समान मुख वाले ( गणेश जी )
5- द्विगु समास - इस समास का पहला पद संख्यावाचक होता है और सम्पूर्ण पद समूह का बोध कराता है ! जैसे -
( सामासिक पद ) ( विग्रह )
1. पंचवटी पांच वट वृक्षों का समूह
2. चौराहा चार रास्तों का समाहार
3. दुसूती दो सूतों का समूह
4. पंचतत्व पांच तत्वों का समूह
5. त्रिवेणी तीन नदियों ( गंगा , यमुना , सरस्वती ) का समाहार
6- द्वन्द्व समास - इस समास में दो पद होते हैं तथा दोनों पदों की प्रधानता होती है ! इनका विग्रह करने के लिए ( और , एवं , तथा , या , अथवा ) शब्दों का प्रयोग किया जाता है !
जैसे -
( सामासिक पद ) ( विग्रह )
1. हानि - लाभ हानि या लाभ
2. नर - नारी नर और नारी
3. लेन - देन लेना और देना
4. भला - बुरा भला या बुरा
5. हरिशंकर विष्णु और शंकर
संधि :- दो पदों में संयोजन होने पर जब दोवर्ण पास -पास आते हैं , तब उनमें जो विकार सहित मेल होता है , उसे संधि कहते हैं !
संधि तीन प्रकार की होती हैं :-
1. स्वर संधि - दो स्वरों के पास -पास आने पर उनमें जो रूपान्तरण होता है , उसे स्वर कहते है ! स्वर संधि के पांच भेद हैं :-
1. दीर्घ स्वर संधि
2. गुण स्वर संधि
3. यण स्वर संधि
4. वृद्धि स्वर संधि
5. अयादि स्वर संधि
1- दीर्घ स्वर संधि- जब दो सवर्णी स्वर पास -पास आते हैं , तो मिलकर दीर्घ हो जाते हैं !
जैसे -
1. अ+अ = आ भाव +अर्थ = भावार्थ
2. इ +ई = ई गिरि +ईश = गिरीश
3. उ +उ = ऊ अनु +उदित = अनूदित
4. ऊ +उ =ऊ वधू +उत्सव =वधूत्सव
5. आ +आ =आ विद्या +आलय = विधालय
2- गुण संधि :- अ तथा आ के बाद इ , ई , उ , ऊ तथा ऋ आने पर क्रमश: ए , ओ तथा अनतस्थ र होता है इस विकार को गुण संधि कहते है !
जैसे :-
1. अ +इ =ए देव +इन्द्र = देवेन्द्र
2. अ +ऊ =ओ जल +ऊर्मि = जलोर्मि
3. अ +ई =ए नर +ईश = नरेश
4. आ +इ =ए महा +इन्द्र = महेन्द्र
5. आ +उ =ओ नयन +उत्सव = नयनोत्सव
3- यण स्वर संधि :- यदि इ , ई , उ , ऊ ,और ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो इनका परिवर्तन क्रमश: य , व् और र में हो जाता है ! जैसे -
1. इ का य = इति +आदि = इत्यादि
2. ई का य = देवी +आवाहन = देव्यावाहन
3. उ का व = सु +आगत = स्वागत
4. ऊ का व = वधू +आगमन = वध्वागमन
5. ऋ का र = पितृ +आदेश = पित्रादेश
3- वृद्धि स्वर संधि :- यदि अ अथवा आ के बाद ए अथवा ऐ हो तो दोनों को मिलाकर ऐ और यदि ओ अथवा औ हो तो दोनों को मिलाकर औ हो जाता है ! जैसे -
1. अ +ए =ऐ एक +एक = एकैक
2. अ +ऐ =ऐ मत +ऐक्य = मतैक्य
3. अ +औ=औ परम +औषध = परमौषध
4. आ +औ =औ महा +औषध = महौषध
5. आ +ओ =औ महा +ओघ = महौघ
5- अयादि स्वर संधि :- यदि ए , ऐ और ओ , औ के पशचात इन्हें छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तो इनका परिवर्तन क्रमश: अय , आय , अव , आव में हो जाता है जैसे -
1. ए का अय ने +अन = नयन
2. ऐ का आय नै +अक = नायक
3. ओ का अव पो +अन = पवन
4. औ का आव पौ +अन = पावन
5. न का परिवर्तन ण में = श्रो +अन = श्रवण
2- व्यंजन संधि :- व्यंजन के साथ स्वर अथवा व्यंजन के मेल से उस व्यंजन में जो रुपान्तरण होता है , उसे व्यंजन संधि कहते हैं जैसे :-
1. प्रति +छवि = प्रतिच्छवि
2. दिक् +अन्त = दिगन्त
3. दिक् +गज = दिग्गज
4. अनु +छेद =अनुच्छेद
5. अच +अन्त = अजन्त
3- विसर्ग संधि : - विसर्ग के साथ स्वर या व्यंजन का मेल होने पर जो विकार होता है , उसे विसर्ग संधि कहते हैं ! जैसे -
1. मन: +रथ = मनोरथ
2. यश: +अभिलाषा = यशोभिलाषा
3. अध: +गति = अधोगति
4. नि: +छल = निश्छल
5. दु: +गम = दुर्गम
हिंदी वाक्य :- वक्ता के कथन को पूर्णत: व्यक्त करने वाले सार्थक शब्द समूह को वाक्य कहते हैं।
हिंदी की देवनागरी लिपि में कुल 52 वर्ण हैं। यह वर्णमाला इस प्रकार है:
स्वर :- अ , आ , इ , ई , उ , ऊ , ऋ , ए , ऐ , ओ , औ ( कुल = 11)
1- कृत प्रत्यय -
वाक्य में पूर्णता तभी आती है जब पद सुनिश्चित क्रम में हों और इन पदों में पारस्परिक अन्वय (समन्वय ) विद्यमान हो। वाक्य की शुद्धता भी पदक्रम एवं अन्वय से सम्बंधित है।
वाक्य के भेद:-
1. रचना की दृष्टि से:- रचना की दृष्टि से वाक्य तीन प्रकार के होते हैं:
(अ) सरल वाक्य
(ब) संयुक्त वाक्य
(स) मिश्रित वाक्य
(अ) सरल वाक्य:- जिन वाक्यों में एक मुख्य क्रिया हो, उन्हें सरल वाक्य कहते हैं। जैसे पानी बरस रहा है।
(ब) संयुक्त वाक्य:- जिन वाक्यों में साधारण या मिश्र वाक्यों का मेल संयोजक अव्ययों द्वारा होते है उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं, जैसे राम घर गया और खाना खाकर सो गया।
(स) मिश्रित वाक्य:- इनमें एक प्रधान उपवाक्य होता है और एक आश्रित उपवाक्य होता है जैसे राम ने कहा कि मैं कल नहीं आ सकूंगा।
2. अर्थ की दृष्टि से वाक्य भेद:- ये आठ प्रकार के होते हैं: -
(1) विधानार्थक :- जिसमें किसी बात के होने का बोध हो। जैसे मोहन घर गया।
(2 ) निषेधात्मक :- जिसमें किसी बात के न होने का बोध हो। जैसे सीता ने गीत नहीं गाया।
(3) आज्ञावाचक :- जिसमें आज्ञा दी गई हो। जैसे यहां बैठो।
(4) प्रश्नवाचक :- जिसमें कोई प्रश्न किया गया हो। जैसे तुम कहाँ रहते हो?
(5) विस्मयवाचक :- जिसमें किसी भाव का बोध हो। जैसे हाय, वह मर गया।
(6) संदेहवाचक :- जिसमें संदेह या संभावना व्यक्त की गई हो। जैसे वह आ गया होगा।
(7) इच्छावाचक :- जिसमें कोई इच्छा या कामना व्यक्त की जाए। जैसे ईश्वर तुम्हारा भला करे।
(8) संकेतवाचक :- जहाँ एक वाक्य दूसरे वाक्य के होने पर निर्भर हो। जैसे यदि गर्मी पड़ती तो पानी बरसता।
हिंदी ध्वनियाँ:-
स्वर :- अ , आ , इ , ई , उ , ऊ , ऋ , ए , ऐ , ओ , औ ( कुल = 11)
अनुस्वार:- अं (कुल = 1)
विसर्ग:- अ: ( : ) (कुल = 1)
व्यंजन:-
कंठ्य :- क , ख, ग, घ, ड़ = 5
तालव्य :- च , छ, ज, झ, ञ = 5
मूर्धन्य :- ट , ठ , ड , ढ , ण = 5
दन्त्य :- त , थ , द , ध , न = 5
ओष्ठ्य :- प , फ , ब , भ , म = 5
अन्तस्थ :- य , र , ल , व = 4
ऊष्म :- श , स , ष , ह = 4
संयुक्त व्यंजन: - क्ष , त्र , ज्ञ , श्र = 4
द्विगुण व्यंजन: - ड़ , ढ़ = 2
कुल वर्ण: 52
स्वर ध्वनियों के उच्चारण में किसी अन्य ध्वनि की सहायता नहीं ली जाती। वायु मुख विवर में बिना किसी अवरोध के बाहर निकलती है, किन्तु व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण में स्वरों की सहायता ली जाती है।
व्यंजन वह ध्वनि है जिसके उच्चारण में भीतर से आने वाली वायु मुख विवर में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में बाधित होती है।
प्रत्यय - प्रत्यय वह शब्दांश है , जिसका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता और जो किसी शब्द के पीछे लगकर उसके अर्थ में विशिष्टता या परिवर्तन ला देते है ! शब्दों के पश्चात जो अक्षर या अक्षर समूह लगाया जाता है उसे प्रत्यय कहते है !
1- कृत प्रत्यय -
1. अन - मनन , चलन
2. आ - लिखा , भूला
3. आव - बहाव , कटाव
4. इयल - मरियल , अड़ियल
5. ई - बोली , हँसी
6. उक - इच्छुक, भिक्षुक
7. कर - जाकर , गिनकर
8. औती - मनौती , फिरौती
9. आवना - डरावना , सुहावना
10. वाई - सुनवाई , कटवाई
2- तद्धित प्रत्यय -
1. ईन - ग्रामीण , कुलीन
2. त: - अत: , स्वत:
3. आई - पण्डिताई , ठकुराई
4. क - चमक , धमक
5. इल - फेनिल , जटिल
6. सा - ऐसा , वैसा
7. ऐरा - बहुतेरा , सवेरा
8. वान - धनवान , गुणवान
9. ल - शीतल , श्यामल
10. मात्र - लेशमात्र , रंचमात्र
Hindi Synonyms : हिंदी पर्यायवाची शब्द :
1. असुर - दनुज, निशाचर, राक्षस ,दैत्य ,दानव ,रजनीचर ,यातुधान
2. अमृत - पीयूष , सुधा ,अमिय ,सोम ,सुरभोग ,मधु
3. अर्जुन - धनंजय , पार्थ , भारत ,गांडीवधारी ,कौन्तेय ,गुडाकेश
4. अरण्य - जंगल ,वन ,कान्तार ,कानन ,विपिन
5. अंग - अंश ,भाग ,हिस्सा ,अवयव
6. आँख - नेत्र ,चक्षु ,लोचन ,दृग ,अक्षि ,विलोचन
7. आम्र - आम ,रसाल ,सहकार, अतिसौरभ ,पिकवल्लभ
8. आकाश - अम्बर ,गगन ,नभ , व्योम , शून्य ,अनन्त ,आसमान ,अन्तरिक्ष
9. अनी - सेना ,फौज ,चमू ,दल ,कटक
10. इच्छा - कामना ,चाह , आकांक्षा ,मनोरथ ,स्पृहा ,वांछा ,ईहा ,अभिलाषा
11. इन्द्र - सुरेश ,सुरेन्द्र ,सुरपति ,शचीपति ,देवेन्द्र ,देवेश ,वासव ,पुरन्दर
12. कमल - राजीव ,पुण्डरीक ,जलज ,पंकज ,सरोज ,सरोरुह ,नलिन ,तामरस ,कंज,अरविन्द, अम्बुज ,सरसिज
13. किरण - अंशु ,रश्मि ,कर ,मयूख , मरीचि ,प्रभा ,अर्चि
14. कपड़ा - वस्त्र ,पट ,चीर ,अम्बर ,वसन
15. कुबेर - धनद ,धनेश ,धनाधिप ,राजराज ,यक्षपति
16. कामदेव - मनसिज ,मनोज ,काम ,मन्मथ ,मार ,अनंग ,पुष्पधन्वा ,मदन ,कंदर्प , मकरध्वज ,रतिनाथ ,मीनकेतु
17. कृष्ण - गोविन्द ,गोपाल ,माधव ,कंसारि ,यशोदानन्दन ,देवकीपुत्र ,वासुदेव ,नन्दनन्दन , हरि ,श्याम ,मुरारि ,राधावल्लभ ,यदुराज ,कान्ह ,कन्हैया
18. कल्पवृक्ष - भंडार ,सुरतरु ,पारिजात ,कल्पद्रुम ,कल्पतरु
19. कोयल - पिक ,परभृत ,कोकिल ,वसंतदूती ,वसंतप्रिय
20. गणेश - लम्बोदर ,गजपति ,गणपति ,एकदन्त ,विनायक ,गजवदन ,मोदकप्रिय , मूषकवाहन ,भवानीनन्दन ,गौरीसुत , गजानन
21. गधा - गदहा ,गर्दभ ,वैशाखनन्दन,रासभ ,खर ,धूसर
22. गंगा - भागीरथी ,जाह्नवी ,मन्दाकिनी ,विष्णुपदी ,देवापगा ,देवनदी ,सुरसरिता ,सुरसरि
23. गर्व - अहं ,अहंकार ,दर्प ,दम्भ ,अभिमान ,घमण्ड
24. गाय - धेनु ,गौ ,सुरभि ,गैया ,दोग्धी ,पयस्विनी ,गऊ
25. चतुर - दक्ष ,पटु ,कुशल ,नागर ,विज्ञ ,निपुण
26. चन्द्रमा -चन्द्र ,राकापति ,राकेश ,मयंक ,सोम ,शशि ,इन्दु ,मृगांक ,हिमकर ,सुधाकर , कलानिधि ,निशाकर
27. चोर - दस्यु ,तस्कर ,रजनीचर ,साहसिक ,खनक ,मोषक ,कुम्भिल
28. जमुना - यमुना ,रविजा ,कालिन्दी ,अर्कजा ,सूर्यसुता ,रवितनया ,तरणि-तनूजा, कृष्णा
29. जीभ - जिह्वा , रसना ,रसिका ,रसला ,रसज्ञा ,जबान
30. झण्डा - ध्वजा ,पताका ,केतु ,केतन ,ध्वज
31. द्रव्य - धन, दौलत ,वित्त ,संपत्ति ,सम्पदा ,विभूति
32. द्रौपदी - कृष्णा ,द्रुपदसुता ,पांचाली ,याज्ञसेनी ,सैरन्ध्री
33. धनुष- धनु ,चाप ,कमान ,शरासन, पिनाक ,कोदण्ड
34. नदी - सरिता ,तटिनी ,आपगा ,निम्नगा ,तरंगिणी ,वाहिनी ,स्रोतस्विनी
35. नाव - नौका ,तरणि ,तरी ,नैया ,वहित्र ,डोंगी
36. पृथ्वी - भू,भूमि ,इला ,धरती ,धरित्री ,मेदिनी ,अचला ,वसुधा ,वसुन्धरा ,उर्वी
37. पत्र - पत्ता ,दल ,पल्लव ,पर्ण ,किसलय
38. पण्डित - प्राज्ञ ,कोविद ,मनीषी ,विद्वान ,सुधी ,विचक्षण
39. पुष्प - फूल ,कुसुम, सुमन ,प्रसून ,पुहुप ,फुल्ल
40. प्रकाश - प्रभा ,कान्ति ,ज्योति ,उजाला ,द्युति
41. बाण - शर , शिलीमुख ,नाराच, विशिख ,इषु ,तीर
42. ब्रह्मा - विधि ,विधाता ,स्वयंभू ,चतुरानन ,चतुर्मुख ,कमलासन ,पितामह ,हिरण्यगर्भा
43. बिजली - चपला ,चंचला ,सौदामिनी ,विद्युत ,दामिनी ,तड़ित ,क्षणप्रभा ,बीजुरी
44. बन्दर - कपि ,वानर ,शाखामृग ,मर्कट ,हरि
45. वृक्ष - तरु ,विटप,पादप ,पेड़ ,रुख ,द्रुम
46. मित्र -सखा ,मीत ,दोस्त ,सहचर ,सुहृद
47. महेश - शिव ,शंकर ,भूतनाथ ,चन्द्रशेखर ,चन्द्रमौलि ,भोले ,रूद्र ,त्रिलोचन ,त्रिनेत्र , आशुतोष ,पशुपति ,शम्भु
48. मछली - मत्स्य ,मीन ,शफरी ,झष ,जलजीवन
49. मनुष्य - मनुज ,आदमी ,इंसान ,मानव ,मनुपुत्र ,नर, व्यक्ति
50. मदिरा -शराब ,मद्य ,सुरा ,सोमरस ,मधु ,आसव ,वारुणी ,हाला
51. माला - हार ,मालिका ,दाम ,गुणिका ,सुमिरनी ,माल्य
52. मोती - मुक्ता , मौक्तिक ,शशिप्रभा ,सीपिज
53. मुक्ति - मोक्ष ,कैवल्य ,परमपद ,सदगति ,निर्वाण ,अपवर्ग
54. मयूर - मोर ,नीलकंठ ,शिखी ,शिवसुतवाहन ,कलापी ,केकी
55. यम - यमराज ,कृतांत ,रविसुत ,धर्मराज ,काल ,अंतक ,जीवितेश ,सूर्यपुत्र ,दण्डधर
56. रात्रि - रात ,यामिनी ,निशा ,विभावरी ,रजनी ,शर्वरी ,क्षणदा ,रैन
57. लक्ष्मी - रमा ,चंचला ,विष्णुप्रिया ,कमला ,पदमा ,कमलासना ,पदमासना ,इन्दिरा , हरिप्रिया
58. सम्पूर्ण - सब ,पूरा ,पूर्ण ,निखिल ,अखिल ,नि:शेष ,सकल
59. सागर - समुद्र ,रत्नाकर ,नदीश ,पयोधि ,वारिधि ,जलधि ,उदधि ,जलनिधि ,नीरनिधि, पारावार ,सिंधु
60. सर्प - नाग ,भुजग ,भुजंग ,पन्नग ,उरग ,व्याल ,विषधर ,अहि ,फणी ,फणधर
61. सोना - स्वर्ण ,कंचन ,कांचन ,कनक , हेम ,जातरूप ,सुवर्ण ,हाटक
62. समूह - समुदाय ,वृन्द ,गण ,संघ ,पुंज ,दल ,झुण्ड
63. सूर्य - रवि ,अर्क ,भानु ,दिनेश ,दिवाकर ,भास्कर ,सविता ,आदित्य ,अंशुमाली , मार्तण्ड ,दिनकर
64. सिंह - हरि ,व्याघ्र ,शार्दूल ,केशरी ,कहेरी ,मृगेन्द्र ,मृगराज ,पंचमुख
65. सुन्दर - रुचिर ,चारू ,रम्य ,रमणीक ,मनभावन ,ललित ,आकर्षक ,मंजुल ,कलित , सुरम्य ,कमनीय ,सुहावना
66. सेविका - दासी ,नौकरानी ,परिचारिका ,भृत्या ,किंकरी ,अनुचरी
67. स्तन - पयोधर ,उरोज ,कुच ,वक्षोज
68. हिमालय - नगराज ,गिरीश ,गिरिवर ,पर्वतेश ,पर्वतराज ,हिमाद्रि ,हिमगिरी ,हिमवान
69. हाथी - हस्ती ,कुंजर ,नाग ,सिन्धुर ,दन्ती ,करि ,द्विरद , गयंद ,गज ,मातंग
70. हाथ - हस्त ,भुजा ,पाणि ,कर ,बाहु
71. हिरन - हरिण ,सारंग ,मृग ,कुरंग ,सुरभी
72. हवा - पवन ,वायु ,वात ,समीर ,प्रभंजन ,अनिल ,समीरण
73. हनुमान - पवनपुत्र ,पवनसुत ,कपीश ,बजरंगी ,महावीर ,आंजनेय ,मारुति ,पवनकुमार , रामदूत ,वज्रांगी ,जितेन्द्रिय
74. हंस - मराल ,चक्रांग ,कलहंस ,मानसीक
75. हितैषी - शुभेच्छु , हितकायी ,मंगलाकांक्षी ,शुभचिंतक ,हितचिन्तक
76. मुर्गा - कुक्कुट ,ताम्रचुड़ ,अरुणशिखा ,ताम्रशिख ,उपाकर
77. भ्रमर - अलि ,मधुकर ,भंवर ,भौंए ,षटपद ,भृंगी
78. धूल - रज ,माटी ,मिट्टी ,मृत्तिका ,रेणु ,धूलि
79. पत्थर - पाहन ,पाषण ,शिला ,प्रस्तर ,उपल ,अश्म
80. तारा - नक्षत्र ,सितारा ,उडु ,तारक
81. तलवार - असि ,कृपाण ,करवाल ,चन्द्रहास ,खड्ग
82. दांत - दन्त ,रद ,द्विज ,मुखनुर
83. बाल - केश ,कच ,कुंतल ,चिकुर ,जटा ,शिरोरुह
84. कली - मुकुल ,कलिका ,कोरक ,जालक
85. बहुत - प्रभूत ,प्रचुर ,अपरिमित ,अमित ,अपार ,विपुल
86. राधा - कृष्ण बल्लभ ,कृष्णप्रिया ,हरिप्रिया ,राधिका ,वृषभानुसुता ,वृषभानुदुलारी , वृषभानुजा ,बृजरानी
87. वर्षा - बारिश, बरसात ,पावस ,वृष्टि ,वर्षण
88. विवाह - ब्याह ,शादी ,पाणिग्रहण ,परिणय
89. सहेली - सखी ,आली ,अलि ,भटू ,सहचरी ,संगिनी ,सहचारिणी
90. साधु - साधू ,संत ,वैरागी ,संन्यासी ,महात्मा
91. पुत्र - सुत, बेटा ,तनय ,आत्मज ,तनुज ,नन्दन ,अपत्य
92. पुत्री - सुता ,बेटी ,तनया ,आत्मजा ,तनुजा ,नन्दिनी ,दुहिता
93. धन - श्री ,सम्पत्ति ,सम्पदा ,लक्ष्मी ,वित्त ,अर्थ
94. बादल - पयोद ,जलज ,अम्बुद ,मेघ ,वारिद ,जलधर ,नीरद ,पयोधर ,वारिधर
95. ब्राह्मण - द्विज ,भूसुर ,भूदेव ,विप्र ,पण्डित
96. विष्णु - हरि ,श्रीपति ,लक्ष्मीपति ,चतुर्भुज ,रमापति ,रमेश ,चक्रपाणि ,जनार्दन ,मुकुन्द, नारायण ,माधव ,केशव,अच्युत
97. अग्नि - आग ,अनल,पावक ,हुताशन,कृशानु ,दहन ,वह्नि ,ज्वाला ,कपिल,शिखि ,धुमध्व्ज
98. अतिथि - अभ्यागत ,पाहुन ,आगन्तुक ,मेहमान
99. अश्व - घोड़ा ,हय ,बाजि ,घोटक ,तुरंग ,सैन्धव
100. चरण - पैर ,पाद ,पाँव ,पग ,पद
काल - क्रिया के करने या होने के समय को काल कहते हैं काल के तीन भेद हैं -
1- भूतकाल - ' भूत का अर्थ है - बीता हुआ । क्रिया के जिस रूप से यह पता चले कि क्रिया का व्यापार पहले समाप्त हो चुका है , वह भूतकाल कहलाता है ; जैसे -
सीता ने खाना पकाया । इस वाक्य से क्रिया के समाप्त होने बोध होता है । अत: यहां भूतकाल क्रिया का प्रयोग हुआ है !
2- वर्तमान काल - वर्तमान का अर्थ है - उपस्थित अर्थात जिस क्रिया से इस बात की सूचना मिले कि क्रिया का व्यापार अभी भी चल रहा है , समाप्त नहीं हुआ , उसे वर्तमान काल कहते हैं ; जैसे - मोहन गाता है ।
3- भविष्यत काल - भविष्यत का अर्थ है - आने वाला समय । अत: क्रिया के जिस रूप से भविष्यत में क्रिया होने का बोध हो , उसे भविष्यत काल की क्रिया कहते हैं;
जैसे - सीता कल दिल्ली जाएगी । ( गा , गे , गी भविष्यत काल के परिचायक चिन्ह हैं !)
क्रिया :- जिस शब्द से किसी कार्य का होना या करना समझा जाय , उसे क्रिया कहते हैं ! जैसे - खाना , पीना , सोना , रहना , जाना आदि !
क्रिया के दो भेद हैं :-
3- नामधातु क्रियाएँ :- क्रिया को छोड़कर दुसरे शब्दों ( संज्ञा , सर्वनाम , एवं विशेषण ) से जो धातु बनते है , उन्हें नामधातु क्रिया कहते है जैसे - अपना - अपनाना , गरम - गरमाना आदि !
वाच्य के तीन भेद हैं -
क्रिया के दो भेद हैं :-
1- सकर्मक क्रिया :- जो क्रिया कर्म के साथ आती है , उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं !
जैसे - मोहन फल खाता है ! ( खाना क्रिया के साथ कर्म फल है )
2- अकर्मक क्रिया :- अकर्मक क्रिया के साथ कर्म नहीं होता तथा उसका फल कर्ता पर पड़ता है !
जैसे - राधा रोती है ! ( कर्म का अभाव है तथा रोती है क्रिया का फल राधा पर पड़ता है )
- रचना के आधार पर क्रिया के पाँच भेद है :-
1- सामान्य क्रिया :-वाक्य में केवल एक क्रिया का प्रयोग ! जैसे - तुम चलो , मोहन पढ़ा आदि !
2- संयुक्त क्रिया :- दो या दो से अधिक धातुओं के मेल से बनी क्रियाएँ संयुक्त क्रियाएँ होती है ! जैसे - गीता स्कूल चली गई आदि !
3- नामधातु क्रियाएँ :- क्रिया को छोड़कर दुसरे शब्दों ( संज्ञा , सर्वनाम , एवं विशेषण ) से जो धातु बनते है , उन्हें नामधातु क्रिया कहते है जैसे - अपना - अपनाना , गरम - गरमाना आदि !
4- प्रेरणार्थक क्रिया :- कर्ता स्वयं कार्य न करके किसी अन्य को करने की प्रेरणा देता है जैसे - लिखवाया , पिलवाती आदि !
5- पूर्वकालिक क्रिया :- जब कोई कर्ता एक क्रिया समाप्त करके दूसरी क्रिया करता है तब पहली क्रिया ' पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है जैसे - वे पढ़कर चले गये , मैं नहाकर जाउँगा आदि !
वाच्य :- क्रिया के जिस रूपांतर से यह बोध हो कि क्रिया द्वारा किए गए विधान का केंद्र बिंदु कर्ता है , कर्म अथवा क्रिया -भाव , उसे वाच्य कहते हैं !
वाच्य के तीन भेद हैं -
1- कर्तृवाच्य - जिसमें कर्ता प्रधान हो उसे कर्तृवाच्य कहते हैं !
कर्तृवाच्य में क्रिया के लिंग , वचन आदि कर्ता के समान होते हैं , जैसे - सीता गाना गाती है , इस वाच्य में सकर्मक और अकर्मक दोनों प्रकार की क्रियाओं का प्रयोग किया जाता है !
कभी -कभी कर्ता के साथ ' ने ' चिन्ह नहीं लगाया जाता !
2- कर्मवाच्य - जिस वाक्य में कर्म प्रधान होता है , उसे कर्मवाच्य कहते हैं !
कर्मवाच्य में क्रिया के लिंग , वचन आदि कर्म के अनुसार होते हैं , जैसे - रमेश से पुस्तक लिखी जाती है ! इसमें केवल ' सकर्मक ' क्रियाओं का प्रयोग होता है !
3- भाववाच्य - जिस वाक्य में भाव प्रधान होता है , उसे भाववाच्य कहते हैं !
भाववाच्य में क्रिया की प्रधानता रहती है , इसमें क्रिया सदा एक वचन , पुल्लिंग और अन्य पुरुष में आती है ! इसका प्रयोग प्राय: निषेधार्थ में होता है ,
जैसे - चला नहीं जाता , पीया नहीं जाता !
- कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य बनाना :-
( कर्तृवाच्य ) ( कर्मवाच्य )
1- रीमा चित्र बनाती है ! - रीमा द्वारा चित्र बनाया जाता है !
2- मैंने पत्र लिखा ! - मुझसे पत्र लिखा गया !
- कर्तृवाच्य से भाववाच्य बनाना :-
( कर्तृवाच्य ) ( भाववाच्य )
1- मैं नहीं पढ़ता ! - मुझसे पढ़ा नहीं जाता !
2- राम नहीं रोता है ! - राम से रोया नहीं जाता !
शब्द :- भाषा की न्यूनतम इकाई वाक्य है और वाक्य की न्यूनतम इकाई शब्द है .
शब्द समूह :- प्रत्येक भाषा का अपना शब्द समूह होता है। इन शब्दों का प्रयोग भाषा के बोलने एवं लिखने में किया जाता है।
सामान्यत: किसी भी भाषा के चार प्रकार के शब्द होते हैं:
सामान्यत: किसी भी भाषा के चार प्रकार के शब्द होते हैं:
1. तत्सम शब्द:- हिंदी में जो शब्द संस्कृत से ज्यों के त्यों ग्रहण कर लिए गए हैं तथा जिनमें कोई ध्वनि परिवर्तन नहीं हुआ है, तत्सम शब्द कहलाते हैं। जैसे राजा ,बालक, लता आदि।
2. तद्भव शब्द:- तद्भव का शाब्दिक अर्थ है तत + भव अर्थात उससे उत्पन्न। हिंदी में प्रयुक्त वह शब्दावली जो अनेक ध्वनि परिवर्तनों से गुज़रती हुई हिंदी में आई है, तद्भव शब्दावली है। जैसे आग, ऊँट, घोडा आदि।
उदाहरण:
संस्कृत शब्द तद्भव शब्द
अग्नि आग
उष्ट्र ऊँट
घोटक घोड़ा
3. देशज शब्द:- ध्वन्यात्मक अनुकरण पर गढ़े हुए वे शब्द जिनकी व्युत्पत्ति किसी तत्सम शब्द से नहीं होती, इस वर्ग में आते हैं। हिंदी में प्रयुक्त कुछ देशज शब्द भोंपू , तेंदुआ, थोथा आदि।
4. विदेशी शब्द:- दूसरी भाषाओं से आये हुए शब्द विदेशी शब्द कहे जाते हैं। हिंदी में विदेशी शब्द दो प्रकार के हैं:
- मुस्लिम शासन के प्रभाव से आये हुए
- अरबी फारसी शब्द
- ब्रिटिश शासन के प्रभाव से आये हुए अंग्रेजी शब्द
हिंदी भाषा में लगभग 2500 अरबी शब्द, 3500 फारसी शब्द और 3000 अंग्रेजी शब्द प्रयुक्त हो रहे हैं।
उदाहरण:
आदत, इनाम, नशा, अदा, अगर, पाजी, तोप, तमगा , सराय, अफसर, कलेक्टर, कोट, मेयर, मादाम , पिकनिक , सूप आदि।
शब्द :- भाषा की न्यूनतम इकाई वाक्य है और वाक्य की न्यूनतम इकाई शब्द है .
शब्द समूह :- प्रत्येक भाषा का अपना शब्द समूह होता है। इन शब्दों का प्रयोग भाषा के बोलने एवं लिखने में किया जाता है।
सामान्यत: किसी भी भाषा के चार प्रकार के शब्द होते हैं:
सामान्यत: किसी भी भाषा के चार प्रकार के शब्द होते हैं:
1. तत्सम शब्द:- हिंदी में जो शब्द संस्कृत से ज्यों के त्यों ग्रहण कर लिए गए हैं तथा जिनमें कोई ध्वनि परिवर्तन नहीं हुआ है, तत्सम शब्द कहलाते हैं। जैसे राजा ,बालक, लता आदि।
2. तद्भव शब्द:- तद्भव का शाब्दिक अर्थ है तत + भव अर्थात उससे उत्पन्न। हिंदी में प्रयुक्त वह शब्दावली जो अनेक ध्वनि परिवर्तनों से गुज़रती हुई हिंदी में आई है, तद्भव शब्दावली है। जैसे आग, ऊँट, घोडा आदि।
उदाहरण:
संस्कृत शब्द तद्भव शब्द
अग्नि आग
उष्ट्र ऊँट
घोटक घोड़ा
3. देशज शब्द:- ध्वन्यात्मक अनुकरण पर गढ़े हुए वे शब्द जिनकी व्युत्पत्ति किसी तत्सम शब्द से नहीं होती, इस वर्ग में आते हैं। हिंदी में प्रयुक्त कुछ देशज शब्द भोंपू , तेंदुआ, थोथा आदि।
4. विदेशी शब्द:- दूसरी भाषाओं से आये हुए शब्द विदेशी शब्द कहे जाते हैं। हिंदी में विदेशी शब्द दो प्रकार के हैं:
- मुस्लिम शासन के प्रभाव से आये हुए
- अरबी फारसी शब्द
- ब्रिटिश शासन के प्रभाव से आये हुए अंग्रेजी शब्द
हिंदी भाषा में लगभग 2500 अरबी शब्द, 3500 फारसी शब्द और 3000 अंग्रेजी शब्द प्रयुक्त हो रहे हैं।
उदाहरण:
आदत, इनाम, नशा, अदा, अगर, पाजी, तोप, तमगा , सराय, अफसर, कलेक्टर, कोट, मेयर, मादाम , पिकनिक , सूप आदि।
Indeclinable - अव्यय ( अविकारी शब्द ) :
अविकारी शब्द - जिन शब्दों जैसे क्रियाविशेषण ,संबंधबोधक ,समुच्चयबोधक , तथा विस्मयादिबोधक आदि के स्वरूप में किसी भी कारण से परिवर्तन नहीं होता, उन्हें अविकारी शब्द कहते हैं ! अविकारी शब्दों को अव्यय भी कहा जाता है !
अव्यय - अव्यय वे शब्द हैं जिनमें लिंग ,पुरुष ,काल आदि की दृष्टि से कोई परिवर्तन नहीं होता, जैसे - यहाँ ,कब, और आदि ! अव्यय शब्द पांच प्रकार के होते हैं -
1 - क्रियाविशेषण - धीरे -धीरे , बहुत
2 - संबंधबोधक - के साथ , तक
3 - समुच्चयबोधक - तथा , एवं ,और
4 - विस्मयादिबोधक - अरे ,हे
5 - निपात - ही ,भी
1 - क्रियाविशेषण अव्यय - जो अव्यय किसी क्रिया की विशेषता बताते हैं ,वे क्रिया विशेषण कहलाते हैं , जैसे - मैं बहुत थक गया हूँ ।
क्रियाविशेषण के चार भेद हैं -
1 - कालवाचक क्रियाविशेषण- जिन शब्दों से कालसंबंधी क्रिया की विशेषता का बोध हो ,
जैसे - कल ,आज ,परसों ,जब ,तब सायं आदि ! ( कृष्ण कल जाएगा । )
2 - स्थानवाचक क्रियाविशेषण- जो क्रियाविशेषण क्रिया के होने या न होने के स्थान का बोध कराएँ ,
जैसे - यहाँ ,इधर ,उधर ,बाहर ,आगे ,पीछे ,आमने ,सामने ,दाएँ ,बाएँ आदि
( उधर मत जाओ । )
3 - परिमाणवाचक क्रियाविशेषण- जहाँ क्रिया के परिमाण / मात्रा की विशेषता का बोध हो ,
जैसे - जरा ,थोड़ा , कुछ ,अधिक ,कितना ,केवल आदि ! ( कम खाओ )
4 - रीतिवाचक क्रियाविशेषण- इसमें क्रिया के होने के ढंग का पता चलता है , जैसे - जोर से,
धीरे -धीरे ,भली -भाँति ,ऐसे ,सहसा ,सच ,तेज ,नहीं ,कैसे ,वैसे ,ज्यों ,त्यों आदि !
( वह पैदल चलता है । )
2 - संबंधबोधक अव्यय - जो अविकारी शब्द संज्ञा अथवा सर्वनाम शब्दों के साथ जुड़कर दूसरे शब्दों से उनका संबंध बताते हैं ,संबंधबोधक अव्यय कहलाते हैं ,
जैसे - के बाद , से पहले ,के ऊपर ,के कारण ,से लेकर ,तक ,के अनुसार ,के भीतर ,की खातिर ,के लिए, के बिना , आदि ! ( विद्या के बिना मनुष्य पशु है । )
3 - समुच्चयबोधक अव्यय - दो शब्दों ,वाक्यांशों या वाक्यों को जोड़ने वाले शब्दों को समुच्चयबोधक अव्यय कहते हैं !
जैसे - कि ,मानों ,आदि ,और ,अथवा ,यानि ,इसलिए , किन्तु ,तथापि ,क्योंकि ,मगर ,बल्कि आदि ! (मोहन पढ़ता है और सोहन लिखता है । )
4 - विस्मयादिबोधक अव्यय - जो अविकारी शब्द हमारे मन के हर्ष ,शोक ,घृणा ,प्रशंसा , विस्मय आदि भावों को व्यक्त करते हैं , उन्हें विस्मयादिबोधक अव्यय कहते हैं ! जैसे -
अरे ,ओह ,हाय ,ओफ ,हे आदि !( इन शब्दों के साथ संबोधन का चिन्ह ( ! ) भी लगाया
जाता हैं ! जैसे - हाय राम ! यह क्या हो गया । )
5 - निपात - जो अविकारी शब्द किसी शब्द या पद के बाद जुड़कर उसके अर्थ में विशेष प्रकार का बल भर देते हैं उन्हें निपात कहते हैं ! जैसे - ही ,भी ,तो ,तक ,भर ,केवल/ मात्र ,
आदि ! ( राम ही लिख रहा है । )
One Word Definitions
वाक्यांश के लिए एक शब्द :
वाक्यांश के लिए एक शब्द :
- जिसका जन्म नहीं होता - अजन्मा
- पुस्तकों की समीक्षा करने वाला - समीक्षक , आलोचक
- जिसे गिना न जा सके - अगणित
- जो कुछ भी नहीं जानता हो - अज्ञ
- जो बहुत थोड़ा जानता हो - अल्पज्ञ
- जिसकी आशा न की गई हो - अप्रत्याशित
- जो इन्द्रियों से परे हो - अगोचर
- जो विधान के विपरीत हो - अवैधानिक
- जो संविधान के प्रतिकूल हो - असंवैधानिक
- जिसे भले -बुरे का ज्ञान न हो - अविवेकी
- जिसके समान कोई दूसरा न हो - अद्वितीय
- जिसे वाणी व्यक्त न कर सके - अनिर्वचनीय
- जैसा पहले कभी न हुआ हो - अभूतपूर्व
- जो व्यर्थ का व्यय करता हो - अपव्ययी
- बहुत कम खर्च करने वाला - मितव्ययी
- सरकारी गजट में छपी सूचना - अधिसूचना
- जिसके पास कुछ भी न हो - अकिंचन
- दोपहर के बाद का समय - अपराह्न
- जिसका निवारण न हो सके - अनिवार्य
- देहरी पर रंगों से बनाई गई चित्रकारी - अल्पना
- आदि से अन्त तक - आघन्त
- जिसका परिहार करना सम्भव न हो - अपरिहार्य
- जो ग्रहण करने योग्य न हो - अग्राह्य
- जिसे प्राप्त न किया जा सके - अप्राप्य
- जिसका उपचार सम्भव न हो - असाध्य
- भगवान में विश्वास रखने वाला - आस्तिक
- भगवान में विश्वास न रखने वाला- नास्तिक
- आशा से अधिक - आशातीत
- ऋषि की कही गई बात - आर्ष
- पैर से मस्तक तक - आपादमस्तक
- अत्यंत लगन एवं परिश्रम वाला - अध्यवसायी
- आतंक फैलाने वाला - आंतकवादी
- देश के बाहर से कोई वस्तु मंगाना - आयात
- जो तुरंत कविता बना सके - आशुकवि
- नीले रंग का फूल - इन्दीवर
- उत्तर -पूर्व का कोण - ईशान
- जिसके हाथ में चक्र हो - चक्रपाणि
- जिसके मस्तक पर चन्द्रमा हो - चन्द्रमौलि
- जो दूसरों के दोष खोजे - छिद्रान्वेषी
- जानने की इच्छा - जिज्ञासा
- जानने को इच्छुक - जिज्ञासु
- जीवित रहने की इच्छा- जिजीविषा
- इन्द्रियों को जीतने वाला - जितेन्द्रिय
- जीतने की इच्छा वाला - जिगीषु
- जहाँ सिक्के ढाले जाते हैं - टकसाल
- जो त्यागने योग्य हो - त्याज्य
- जिसे पार करना कठिन हो - दुस्तर
- जंगल की आग - दावाग्नि
- गोद लिया हुआ पुत्र - दत्तक
- बिना पलक झपकाए हुए - निर्निमेष
- जिसमें कोई विवाद ही न हो - निर्विवाद
- जो निन्दा के योग्य हो - निन्दनीय
- मांस रहित भोजन - निरामिष
- रात्रि में विचरण करने वाला - निशाचर
- किसी विषय का पूर्ण ज्ञाता - पारंगत
- पृथ्वी से सम्बन्धित - पार्थिव
- रात्रि का प्रथम प्रहर - प्रदोष
- जिसे तुरंत उचित उत्तर सूझ जाए - प्रत्युत्पन्नमति
- मोक्ष का इच्छुक - मुमुक्षु
- मृत्यु का इच्छुक - मुमूर्षु
- युद्ध की इच्छा रखने वाला - युयुत्सु
- जो विधि के अनुकूल है - वैध
- जो बहुत बोलता हो - वाचाल
- शरण पाने का इच्छुक - शरणार्थी
- सौ वर्ष का समय - शताब्दी
- शिव का उपासक - शैव
- देवी का उपासक - शाक्त
- समान रूप से ठंडा और गर्म - समशीतोष्ण
- जो सदा से चला आ रहा हो - सनातन
- समान दृष्टि से देखने वाला - समदर्शी
- जो क्षण भर में नष्ट हो जाए - क्षणभंगुर
- फूलों का गुच्छा - स्तवक
- संगीत जानने वाला - संगीतज्ञ
- जिसने मुकदमा दायर किया है - वादी
- जिसके विरुद्ध मुकदमा दायर किया है - प्रतिवादी
- मधुर बोलने वाला - मधुरभाषी
- धरती और आकाश के बीच का स्थान - अन्तरिक्ष
- हाथी के महावत के हाथ का लोहे का हुक - अंकुश
- जो बुलाया न गया हो - अनाहूत
- सीमा का अनुचित उल्लंघन - अतिक्रमण
- जिस नायिका का पति परदेश चला गया हो - प्रोषित पतिका
- जिसका पति परदेश से वापस आ गया हो - आगत पतिका
- जिसका पति परदेश जाने वाला हो - प्रवत्स्यत्पतिका
- जिसका मन दूसरी ओर हो - अन्यमनस्क
- संध्या और रात्रि के बीचकी वेला - गोधुलि
- माया करने वाला - मायावी
- किसी टूटी - फूटी इमारत का अंश - भग्नावशेष
- दोपहर से पहले का समय - पूर्वाह्न
- कनक जैसी आभा वाला - कनकाय
- हृदय को विदीर्ण कर देने वाला - हृदय विदारक
- हाथ से कार्य करने का कौशल - हस्तलाघव
- अपने आप उत्पन्न होने वाला - स्त्रैण
- जो लौटकर आया है - प्रत्यागत
- जो कार्य कठिनता से हो सके - दुष्कर
- जो देखा न जा सके - अलक्ष्य
- बाएँ हाथ से तीर चला सकने वाला - सव्यसाची
- वह स्त्री जिसे सूर्य ने भी न देखा हो - असुर्यम्पश्या
- यज्ञ में आहुति देने वाला - हौदा
- जिसे नापना सम्भव न हो - असाध्य
- जिसने किसी दूसरे का स्थान अस्थाई रूप से ग्रहण किया हो - स्थानापन्
Paksh - पक्ष :
क्रिया के जिस रूप से क्रिया प्रक्रिया अर्थात क्रिया व्यापार का बोध होता है ,उसे क्रिया का पक्ष कहते हैं ! यह क्रिया- व्यापार दो दृष्टियों से देखा जा सकता है ! पहली दृष्टि से हम देखते हैं कि क्रिया की प्रक्रिया आरंभ होने वाली है अथवा आरंभ हो चुकी है ,अथवा वर्तमान में चालू है या हो चुकी है ! दूसरी दृष्टि में क्रिया -प्रक्रिया को एक इकाई के रूप में देखते हैं ! दोनों दृष्टियों के प्रमुख पक्ष उदाहरण सहित इस प्रकार हैं -
1 . (क ) आरंभदयोतक पक्ष -इस पक्ष में क्रिया के आरंभ होने की स्थिति का बोध होता है ,
जैसे - अब मोहन खेलने लगा है !
(ख ) सातप्यबोधक पक्ष - इससे क्रिया की प्रक्रिया के चालू रहने का बोध होता है ,जैसे -
गीता कितना अच्छा गा रही है !
(ग ) प्रगतिदयोतक पक्ष - इससे क्रिया की निरंतर प्रगति का बोध होता है ,जैसे -
भीड़ बढ़ती जा रही है !
(घ ) पूर्णतादयोतक पक्ष - इस पक्ष से क्रिया के पूरी तरह समाप्त हो जाने का बोध होता है,
जैसे - वह अब तक काफी खेल चूका है !
2. (क ) नित्यतादयोतक पक्ष - इस पक्ष से क्रिया के नित्य अर्थात सदा बने रहने का बोध होता
है , इसका आदि -अंत नहीं होता , जैसे - पृथ्वी गोल है !, सूरज पूर्व में निकलता है !
(ख ) अभ्यासदयोतक पक्ष - यह पक्ष क्रिया के स्वभाववश होने का सूचक है , जैसे -
वह दिन भर मेहनत करता था तब सफल हुआ !
उच्चारणगत अशुद्धियाँ = बोलने और लिखने में होने वाली अशुद्धियाँ प्राय: दो प्रकार की होती हैं
( इनके अतिरिक्त दो रसों की चर्चा और होती है )-
1 - संज्ञा सम्बन्धी अशुद्धियाँ =
वचन के दो भेद होते हैं -
- व्याकरण सम्बन्धी तथा उच्चारण सम्बन्धी , यहाँ हम उच्चारण एवं वर्तनी सम्बन्धी महत्वपूर्ण त्रुटियों की ओर संकेत करंगे , ये अशुद्धियाँ स्वर एवं व्यंजन और विसर्ग तीनों वर्गों से सम्बन्धित होती हैं , व्यंजन सम्बन्धी त्रुटियाँ वर्तनी के अन्तर्गत आ गई हैं , नीचे स्वर
एवं विसर्ग सम्बन्धी अशुद्धियों की और इंगित किया गया है !
अशुद्धियाँ और उनके शुद्ध रूप -
1 . - स्वर या मात्रा सम्बन्धी अशुद्धियाँ -
1 - अ ,आ सम्बन्धी भूलें -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- अहार आहार
- अजमायश आजमाइश
2 - इ , ई सम्बन्धी भलें = इ की मात्रा होनी चाहिए , ई की नहीं -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- कोटी कोटि
- कालीदास कालिदास
= इ की मात्रा छूट गई है , होनी चाहिए -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- वाहनी वाहिनी
- नीत नीति
= इ की मात्रा नहीं होनी चाहिए -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- वापिस वापस
- अहिल्या अहल्या
= ई की मात्रा होनी चाहिए , इ की नहीं -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- निरोग नीरोग
- दिवाली दीवाली
3 - उ ,ऊ सम्बन्धी भूलें -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- तुफान तूफान
- वधु वधू
4 - ऋ सम्बन्धी भलें -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- उरिण उऋण
- आदरित आदृत
5 - ए ,ऐ ,अय सम्बन्धी भलें -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- नैन नयन
- सैना सेना
- चाहिये चाहिए
6 - ई और यी सम्बन्धी भलें -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- नई नयी
- स्थाई स्थायी
7 - ओ , और ,अव ,आव सम्बन्धी भूलें -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- चुनाउ चुनाव
- होले हौले
8 - अनुस्वार और अनुनासिक सम्बन्धी भलें -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- गंवार गँवार
- अंधेरा अँधेरा
9 - पंचम वर्ण का प्रयोग - ज् , ण ,न , म , ङ् को पंचमाक्षर कहते हैं ,ये अपने वर्ग के व्यंजन के साथ प्रयुक्त होते हैं -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- कन्धा कंधा
- सम्वाद संवाद
10 - विसर्ग सम्बन्धी भूलें -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- दुख दुःख
- अंताकरण अंत:करण
- सन्धि करने में भूलें - ( स्वर सन्धि )-
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- अत्याधिक अत्यधिक
- अनाधिकार अनधिकार
- सदोपदेश सदुपदेश
- व्यंजन सन्धि में भूलें -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- महत्व महत्त्व
- उज्वल उज्ज्वल
- सम्हार संहार
- विसर्ग सन्धि में भूलें -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- अतेव अतएव
- दुस्कर दुष्कर
- यशगान यशोगान
- समास सम्बन्धी भूलें -
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
- उस्मा ऊष्मा
- ऊषा उषा
- अध्यन अध्ययन
रस - काव्य को पढ़ते या सुनते समय हमें जिस आनन्द की अनुभूति होती है ,उसे ही रस कहा जाता है ! रसों की संख्या नौ मानी गई हैं !
रस का नाम स्थायीभाव
1- श्रृंगार - रति
2- वीर - उत्साह
3- रौद्र - क्रोध
4- वीभत्स - जुगुप्सा ( घृणा )
5- अदभुत - विस्मय
6- शान्त - निर्वेद
7- हास्य - हास
8- भयानक - भय
9- करुण - शोक
( इनके अतिरिक्त दो रसों की चर्चा और होती है )-
10- वात्सल्य - सन्तान विषयक रति
11- भक्ति - भगवद विषयक रति
वाक्य अशुद्धि शोधन = सार्थक एवं पूर्ण विचार व्यक्त करने वाले शब्द समूह को वाक्य कहा जाता है ! प्रत्येक भाषा का मूल ढांचा वाक्यों पर ही आधारित होता है ! इसलिए यह अनिवार्य है कि वाक्य रचना में पद -क्रम और अन्वय का विशेष ध्यान रखा जाए ! इनके प्रति सावधान न रहने से वाक्य रचना में कई प्रकार की भूलें हो जाती हैं !
वाक्य रचना के लिए अभ्यास की परम आवश्यकता होती है ! जैसे -
वाक्य रचना के लिए अभ्यास की परम आवश्यकता होती है ! जैसे -
1 - संज्ञा सम्बन्धी अशुद्धियाँ =
अशुद्ध शुद्ध
- वह आंख से काना है । वह काना है ।
- आप शनिवार के दिन चले जाएं । आप शनिवार को चले जाएं ।
2 - परसर्ग सम्बन्धी अशुद्धियाँ=
अशुद्ध शुद्ध
- आप भोजन किया ? आपने भोजन किया ।
- उसने नहाया । वह नहाया ।
3 - लिंग सम्बन्धी अशुद्धियाँ =
अशुद्ध शुद्ध
- हमारी नाक में दम है । हमारे नाक में दम है ।
- मुझे आदेश दी । मुझे आदेश दिया ।
4 - वचन सम्बन्धी अशुद्धियाँ =
अशुद्ध शुद्ध
- उसे दो रोटी दे दो । उसे दो रोटियां दे दो ।
- मेरा कान मत खाओ । मेरे कान मत खाओ ।
5 - सर्वनाम सम्बन्धी अशुद्धियाँ =
अशुद्ध शुद्ध
- तुम तुम्हारे रास्ते लगो । तुम अपने रास्ते लगो ।
- हमको क्या ? हमें क्या ?
6 - विशेषण सम्बन्धी अशुद्धियाँ =
अशुद्ध शुद्ध
- मुझे छिलके वाला धान चाहिए । मुझे धान चाहिए ।
- एक गोपनीय रहस्य । एक रहस्य ।
7 - क्रिया सम्बन्धी अशुद्धियाँ =
अशुद्ध शुद्ध
- उसे हरि को पटक डाला । उसने हरि को पटक दिया ।
- वह चिल्ला उठा । वह चिल्ला पड़ा ।
8 - मुहावरे सम्बन्धी अशुद्धियाँ =
अशुद्ध शुद्ध
- वह श्याम पर बरस गया । वह श्याम पर बरस पड़ा ।
- उसकी अक्ल चक्कर खा गई । उसकी अक्ल चकरा गई ।
9 - क्रिया विशेषण सम्बन्धी अशुद्धियाँ =
अशुद्ध शुद्ध
- वह लगभग रोने लगा । वह रोने लगा ।
- उसका सर नीचे था । उसका सर नीचा था ।
10 - अव्यय सम्बन्धी अशुद्धियाँ =
अशुद्ध शुद्ध
- वे संतान को लेकर दुखी थे । वे संतान के कारण दुखी थे ।
- वहां अपार जनसमूह एकत्रित था । वहां अपार जन -समूह एकत्र था ।
11 - वाक्यगत सम्बन्धी अशुद्धियाँ =
अशुद्ध शुद्ध
- तलवार की नोक पर - तलवार की धार पर -
- मेरी आयु बीस की है । मेरी अवस्था बीस वर्ष की है ।
12 - पुनरुक्ति सम्बन्धी अशुद्धियाँ =
अशुद्ध शुद्ध
- मेरे पिता सज्जन पुरुष हैं । मेरे पिता सज्जन हैं ।
- वे गुनगुने गर्म पानी से स्नान करते हैं । वे गुनगुने पानी से स्नान करते हैं ।
वचन:- संज्ञा अथवा अन्य विकारी शब्दों के जिस रूप में संख्या का बोध हो , उसे वचन कहते हैं !
वचन के दो भेद होते हैं -
1- एकवचन :- संज्ञा के जिस रूप से एक ही वस्तु , पदार्थ या प्राणी का बोध होता है , उसे एकवचन कहते हैं !
जैसे - लड़की , बेटी , घोड़ा , नदी आदि !
2- बहुवचन :- संज्ञा के जिस रूप से एक से अधिक वस्तुओं , पदार्थों या प्राणियों का बोध होता है , उसे बहुवचन कहते हैं !
जैसे - लड़कियाँ , बेटियाँ , घोड़े , नदियाँ आदि !
- एकवचन से बहुवचन बनाने के नियम इस प्रकार हैं -
1- अ को एं कर देने से = रात = रातें
2- अनुस्वारी ( . ) लगाने से = डिबिया = डिबियां
3- यां जोड़ देने से = रीति = रीतियां
4- एं लगाने से = माला = मालाएं
5- आ को ए कर देने से = बेटा = बेटे
Vritti - वृत्ति :
वृत्ति का अर्थ है मन:स्थिति। इसे क्रियार्थ भी कहते हैं। वक्ता जो कुछ भी कहता है, वह मन:स्थिति अर्थात मन में उत्पन्न भाव-विचार के अनुसार कहता है। अत: वृत्ति का लक्षण हुआ - क्रिया के जिस रूप से वक्ता की वृत्ति अथवा मन:स्थिति का बोध होता है उसे वृत्ति या क्रियार्थ कहते हैं।
हिंदी में वृत्ति के पांच भेद हैं :-
1. विध्यर्थ:- विध्यर्थ का अर्थ है - विधि सम्बन्धी तात्पर्य अथवा क्रिया करने की देने का भाव। उदाहरण : ज़रा समय 'बताइए। यहाँ 'समय बताइए' पूछने वाले की इच्छा का बोधक है अत: बताइए क्रिया रूप से विध्यर्थ का बोध होता है।
2. निश्चयार्थ :- जिस क्रिया रूप से कार्य के होने का निश्चित रूप से पता चलता है उसे निश्चयार्थ कहते हैं। जैसे सुरेश क्रिकेट खेल रहा है। यहाँ 'खेल रहा है' क्रिया से निश्चयार्थ प्रकट होता है। सत्य और असत्य के सूचक वाक्य निश्चयार्थ के अंतर्गत आते हैं।
3. संभावनार्थ:- कुछ कथन निश्चित न होकर अनिश्चित होते हैं जैसे संभव है आज वर्षा हो अत: क्रिया के जिस रूप से संभावना का बोध होता है उसे संभावनार्थ कहते हैं।
4. संदेहार्थ :- जिस क्रिया से क्रिया के होने में संदेह का भाव हो उसे संदेहार्थ कहते हैं, अर्थात इस क्रिया के होने के साथ कुछ संदेह बना रहता है जैसे वह गाँव से चल पड़ा होगा इस कथन में निश्चय से साथ कुछ संदेह भी है।
5. संकेतार्थ:- कार्य सिद्धि के लिए किसी शर्त का पूरा होना ज़रूरी होता है अत: जिस वाक्य में दो क्रियाएं होती हैं और दोनों में कार्य - कारण संबंध होता है अर्थात एक क्रिया में कार्य की होने की तथा दूसरी में उसके परिणाम की सूचना रहती है उसे संकेतार्थ क्रिया कहते हैं। दूसरे शब्दों में जहाँ एक कार्य का होना दूसरे कार्य के होने पर निर्भर करता है वहां संकेतार्थ क्रिया होती है जैसे अगर बस आ जायेगी तो मैं ठीक समय पर पहुँच जाउंगा। यहाँ 'अगर', 'तो', से संकेतार्थ भाव स्पष्ट है.
अनेकार्थी शब्द -
अरुण - लाल ,सूर्य का सारथि ,सूर्य
अज - दशरथ के पिता ,बकरा ,ब्रह्मा
अर्णव - समुंद्र ,सूर्य ,इंद्र
आम - आम का फल ,सर्वसाधारण
इंद्र - राजा ,देवताओं का राजा
इंदु - चन्द्रमा ,कपूर
उमा - पार्वती ,दुर्गा ,हल्दी
उत्तर - जवाब ,एक दिशा
काल - समय ,मृत्यु ,यमराज
कोटि - करोड़ श्रेणी ,धनुष का सिरा
कपि - बंदर ,हाथी ,सूर्य
केतु - पताका ,एक अशुभ ग्रह
कुल - वंश ,सम्पूर्ण
खर - दुष्ट ,गधा ,तिनका
ख - आकाश ,सूर्य ,स्वर्ण
खत - पत्र ,लिखावट
गति - चाल ,हालत ,मोक्ष
घन - घना ,बादल
घट - घड़ा ,शरीर ,हृदय
चश्मा - ऐनक ,झरना
चूना - टपकना ,पुताई करने वाला चूना
छत्र - छाता ,कुकुरमुत्ता ,छतरी
पास - उत्तीर्ण ,निकट
बाग - उपवन ,लगाम
लाल - माणिक्य ,पुत्र ,रक्तवर्णी
वर - श्रेष्ट ,दूल्हा ,वरदान
रस - काव्यानंद ,भोज्यरस ,स्वाद
मित्र - सूर्य ,दोस्त
मंगल - कल्याण ,एक ग्रह
वंश - बाँस ,कुल
जरा - बुढ़ापा ,थोड़ा -सा ,जला हुआ
तरणि - सूर्य ,नौका
दक्ष - चतुर ,ब्रह्मा के पुत्र
धनंजय - अर्जुन, अग्नि
पति - स्वामी, शौहर
पोत - जहाज , मोती , बच्चा
पत्र - चिट्ठी , पत्ता
पद - पैर , पोस्ट , छंद
परदा - आवरण , पट, घूंघट
परी - अप्सरा ,लेटी ,घी मापने का पात्र
नाना - माता का पिता ,विविध
मुद्रा - अंगूठी ,सिक्का ,भावमुद्रा
भूत - भूत प्रेत ,भूतकाल
स्नेह - प्रेम ,तेल
हस्ती - हाथी ,हैसियत
सैंधव - घोड़ा ,नमक
श्री - शोभा ,लक्ष्मी ,सम्पत्ति
श्याम - कृष्ण ,काला
रंभा - एक अप्सरा ,केला ,वेश्या
रसा - पृथ्वी ,जीभ ,शोरबा
लय - लीन होना ,ताल ,प्रवाह
श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द :- ये शब्द चार शब्दों से मिलकर बना है ,श्रुति+सम +भिन्न +अर्थ , इसका अर्थ है . सुनने में समान लगने वाले किन्तु भिन्न अर्थ वाले दो शब्द अर्थात वे शब्द जो सुनने और उच्चारण करने में समान प्रतीत हों, किन्तु उनके अर्थ भिन्न -भिन्न हों , वे श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द कहलाते हैं .
ऐसे शब्द सुनने या उच्चारण करने में समान भले प्रतीत हों ,किन्तु समान होते नहीं हैं , इसलिए उनके अर्थ में भी परस्पर भिन्नता होती है ; जैसे - अवलम्ब और अविलम्ब . दोनों शब्द सुनने में समान लग रहे हैं , किन्तु वास्तव में समान हैं नहीं ,अत: दोनों शब्दों के अर्थ भी पर्याप्त भिन्न हैं , 'अवलम्ब ' का अर्थ है - सहारा , जबकि अविलम्ब का अर्थ है - बिना विलम्ब के अर्थात शीघ्र .
ये शब्द निम्न इस प्रकार से है -
अंस - अंश = कंधा - हिस्सा
अंत - अत्य = समाप्त - नीच
अन्न -अन्य = अनाज -दूसरा
अभिराम -अविराम = सुंदर -लगातार
अम्बुज - अम्बुधि = कमल -सागर
अनिल - अनल = हवा -आग
अश्व - अश्म = घोड़ा -पत्थर
अनिष्ट - अनिष्ठ = हानि - श्रद्धाहीन
अचर - अनुचर = न चलने वाला - नौकर
अमित - अमीत = बहुत - शत्रु
अभय - उभय = निर्भय - दोनों
अस्त - अस्त्र = आँसू - हथियार
असित - अशित = काला - भोथरा
अर्घ - अर्घ्य = मूल्य - पूजा सामग्री
अली - अलि = सखी - भौंरा
अवधि - अवधी = समय - अवध की भाषा
आरति - आरती = दुःख - धूप-दीप
आहूत - आहुति = निमंत्रित - होम
आसन - आसन्न = बैठने की वस्तु - निकट
आवास - आभास = मकान - झलक
आभरण - आमरण = आभूषण - मरण तक
आर्त्त - आर्द्र = दुखी - गीला
ऋत - ऋतु = सत्य - मौसम
कुल - कूल = वंश - किनारा
कंगाल - कंकाल = दरिद्र - हड्डी का ढाँचा
कृति - कृती = रचना - निपुण
कान्ति - क्रान्ति = चमक - उलटफेर
कलि - कली = कलयुग - अधखिला फूल
कपिश - कपीश = मटमैला - वानरों का राजा
कुच - कूच = स्तन - प्रस्थान
कटिबन्ध - कटिबद्ध = कमरबन्ध - तैयार / तत्पर
छात्र - क्षात्र = विधार्थी - क्षत्रिय
गण - गण्य = समूह - गिनने योग्य
चषक - चसक = प्याला - लत
चक्रवाक - चक्रवात = चकवा पक्षी - तूफान
जलद - जलज = बादल - कमल
तरणी - तरुणी = नाव - युवती
तनु - तनू = दुबला - पुत्र
दारु - दारू = लकड़ी - शराब
दीप - द्वीप = दिया - टापू
दिवा - दीवा = दिन - दीपक
देव - दैव = देवता - भाग्य
नत - नित = झुका हुआ - प्रतिदिन
नीर - नीड़ = जल - घोंसला
नियत - निर्यात = निश्चित - भाग्य
नगर - नागर = शहर - शहरी
निशित - निशीथ = तीक्ष्ण - आधी रात
नमित - निमित = झुका हुआ - हेतु
नीरद - नीरज = बादल - कमल
नारी - नाड़ी = स्त्री - नब्ज
निसान - निशान = झंडा - चिन्ह
निशाकर - निशाचर = चन्द्रमा - राक्षस
पुरुष - परुष = आदमी - कठोर
प्रसाद - प्रासाद = कृपा - महल
परिणाम - परिमाण = नतीजा - मात्रा
Thanks for help
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